सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत अपनी पत्नी को आग लगाने के आरोपी व्यक्ति को बरी कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को बहाल कर दिया है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने मृतका के मृत्युकालिक कथन (Dying Declaration) को “काल्पनिक और अति-तकनीकी आधारों” (speculative and hyper-technical grounds) पर खारिज करके त्रुटि की थी।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या बयान दर्ज करने के समय और तरीके में मामूली विसंगतियों के आधार पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत दी गई सजा को पलटना उचित था। शीर्ष अदालत ने माना कि डाइंग डिक्लेरेशन स्वैच्छिक और विश्वसनीय था, और हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी करके “घोर त्रुटि” (manifest error) की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 7 दिसंबर 2009 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, चंबा जिले के रामपुर गांव में आरोपी चमन लाल ने अपनी पत्नी सरो देवी पर केरोसिन तेल डालकर आग लगा दी। आरोप है कि 2002 में शादी करने वाले इस जोड़े के संबंध तनावपूर्ण थे और आरोपी अक्सर अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह करता था।
घटना के बाद पीड़िता को जिला अस्पताल, चंबा ले जाया गया। 8 दिसंबर 2009 को तहसीलदार-सह-कार्यकारी मजिस्ट्रेट (PW-1) ने उनका बयान दर्ज किया, जिसे मृत्युकालिक कथन माना गया। अपने बयान में, सरो देवी ने स्पष्ट रूप से आरोप लगाया कि उनके पति ने उन्हें “कंजरी” (दुश्चरित्र महिला) कहकर अपमानित किया और फिर आग लगा दी। इलाज के दौरान 15 जनवरी 2010 को उनकी मृत्यु हो गई।
सत्र न्यायाधीश, चंबा ने 16 जुलाई 2010 को चमन लाल को धारा 302 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हालांकि, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 26 अगस्त 2014 को अपने फैसले में आरोपी को बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने बरी करने के पीछे तहसीलदार के अस्पताल पहुंचने के समय में विसंगति और बयान दर्ज करने के तरीके पर संदेह को आधार बनाया था। इसके खिलाफ हिमाचल प्रदेश राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
पक्षों की दलीलें
राज्य (अपीलकर्ता) का तर्क: राज्य की ओर से पेश वकील श्री विवेक कुमार ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने तहसीलदार के अस्पताल पहुंचने के समय को लेकर संदेह करने में गलती की है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने चुनिंदा रूप से मृतका के भाई (PW-2) की गवाही पर भरोसा किया, जबकि तहसीलदार (PW-1) और पुलिस उपाधीक्षक (PW-10) ने लगातार गवाही दी थी कि बयान सुबह 11:00-11:15 बजे के आसपास दर्ज किया गया था।
राज्य ने यह भी दलील दी कि डाइंग डिक्लेरेशन एक स्वतंत्र लोक सेवक द्वारा मेडिकल फिटनेस प्रमाण पत्र प्राप्त करने के बाद दर्ज किया गया था और यह अन्य साक्ष्यों से पूरी तरह मेल खाता है।
प्रतिवादी (आरोपी) का तर्क: प्रतिवादी की ओर से एमिकस क्यूरी श्री कृष्ण पाल सिंह ने तर्क दिया कि एफआईआर में दर्ज घटना के शुरुआती संस्करण में आरोपी का नाम नहीं था। उन्होंने पक्षद्रोही गवाहों (hostile witnesses) की गवाही का हवाला दिया, जिसमें वार्ड सदस्य (PW-4) और आरोपी की बुआ (PW-5) शामिल थे, जिन्होंने दावा किया था कि मृतका ने खुद को आग लगाई थी।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि पत्नी को बचाने की कोशिश में आरोपी के हाथ भी करीब 3% जल गए थे, जो आत्मदाह (self-immolation) के सिद्धांत का समर्थन करता है। साथ ही, बयान दर्ज करते समय पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति पर भी सवाल उठाए गए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 32(1) के तहत डाइंग डिक्लेरेशन की वैधता की जांच की। खुशाल राव बनाम बॉम्बे राज्य और लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि यदि डाइंग डिक्लेरेशन सच्चा और स्वैच्छिक है, तो बिना किसी अन्य पुष्टि (corroboration) के भी केवल उसी आधार पर सजा दी जा सकती है।
डाइंग डिक्लेरेशन की विश्वसनीयता पर पीठ ने पाया कि इस मामले में डाइंग डिक्लेरेशन “स्वैच्छिक, सच्चा और विश्वसनीय” था। कोर्ट ने नोट किया कि यह बयान डॉक्टर द्वारा मरीज को फिट घोषित करने के बाद एक तटस्थ अधिकारी (PW-1) द्वारा दर्ज किया गया था।
हाईकोर्ट के तर्कों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से दो आधारों पर डाइंग डिक्लेरेशन पर अविश्वास जताया: (i) बयान दर्ज करने के समय में कथित विसंगति; और (ii) यह संदेह कि क्या PW-1 ने खुद बयान लिखा या केवल डिक्टेट किया। हमारी सुविचारित राय में, दोनों ही आधार अस्थिर हैं।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समय को लेकर मामूली विसंगति अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करती। प्रक्रिया के संबंध में पीठ ने कहा:
“मजिस्ट्रेट की देखरेख में डाइंग डिक्लेरेशन दर्ज करना इसे अमान्य नहीं बनाता… हाईकोर्ट ने साक्ष्यों में न मिलने वाले अनुमानों के आधार पर डाइंग डिक्लेरेशन को खारिज कर दिया।”
बचाव पक्ष की दलील पर कोर्ट ने आरोपी के खुद जलने और पत्नी को बचाने के तर्क पर कहा:
“आरोपी द्वारा आग बुझाने का प्रयास करना और मामूली रूप से जल जाना, अपने आप में उसे दोषमुक्त नहीं करता है। इस तरह का आचरण अपराध करने के बाद निर्दोष दिखने का प्रयास भी हो सकता है।”
निर्णय (Decision)
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के सुविचारित फैसले को पलटकर “घोर त्रुटि” (manifest error) की है, जो तय सिद्धांतों के विपरीत थी।
पीठ ने फैसला सुनाया:
“हाईकोर्ट ने इस महत्वपूर्ण साक्ष्य को काल्पनिक और अति-तकनीकी आधारों पर खारिज करने में गलती की… तदनुसार, राज्य द्वारा दायर आपराधिक अपील स्वीकार की जाती है। हाईकोर्ट द्वारा पारित बरी करने का निर्णय रद्द किया जाता है और ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा बहाल की जाती है।”
आरोपी को शेष सजा काटने के लिए तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम चमन लाल
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 430 ऑफ 2018
- कोरम: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन

