मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को दिए जाने वाले 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़ी सभी याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस मामले की अंतिम सुनवाई 27 अप्रैल से लगातार तीन दिनों तक की जाएगी।
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजन बेंच ने गुरुवार को मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे जल्द निपटाने के निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनवाई शुरू होने से तीन दिन पहले संबंधित दस्तावेज जमा करने को कहा है। साथ ही, बेंच ने सभी पक्षों के वकीलों को सुनवाई के दौरान अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया है।
ओबीसी कोटा को लेकर कानूनी विवाद काफी समय से लंबित है, जिसमें आरक्षण के पक्ष और विरोध में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। शुरुआती सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 27 प्रतिशत आरक्षण के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। इसके बाद राज्य सरकार और अन्य पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) दायर की थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इन याचिकाओं को अंतिम निर्णय के लिए वापस हाईकोर्ट भेज दिया। गुरुवार की कार्यवाही के दौरान, आरक्षण का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट आदित्य संघी ने बेंच को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने के भीतर इन याचिकाओं का निपटारा करने का निर्देश दिया था, जिसमें से डेढ़ महीने का समय पहले ही बीत चुका है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट रामेश्वर सिंह ने दो एसएलपी (SLP) से जुड़ी तकनीकी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उन दो याचिकाओं को वापस बुला लिया है जो छत्तीसगढ़ से संबंधित थीं, लेकिन गलती से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट भेज दी गई थीं।
27 प्रतिशत आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं का मुख्य आधार इंदिरा साहनी और मराठा आरक्षण से जुड़े ऐतिहासिक फैसले हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, ओबीसी कोटे के समर्थकों का तर्क है कि सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का निर्धारण समुदाय की वास्तविक आबादी के अनुपात में होना चाहिए।
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज और एडवोकेट जनरल प्रशांत सिंह की सहमति के बाद, डिविजन बेंच ने 27 अप्रैल को दोपहर 12:30 बजे से नियमित सुनवाई शुरू करने का समय निर्धारित किया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि दलीलों की जटिलता को देखते हुए आवश्यकता पड़ी, तो इन तीन दिनों की अवधि को आगे भी बढ़ाया जा सकता है।

