पिता की मृत्यु के बाद विवाहित बेटी भी अनुग्रह राशि (Ex-gratia) और लीव एनकैशमेंट की हकदार; वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव असंवैधानिक: मप्र हाईकोर्ट 

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने लैंगिक समानता और कानूनी वारिसों के अधिकारों को सुरक्षित करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी विवाहित बेटी को सिर्फ इस आधार पर अनुग्रह राशि (Ex-gratia) और अर्जित अवकाश के बदले भुगतान (Leave Encashment) से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह विवाहित है। न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि सेवा लाभों का भुगतान कानूनी वारिसों को बिना किसी वैवाहिक भेदभाव के किया जाना चाहिए।

यह याचिका (रिट याचिका संख्या 37546/2024) प्रसन्ना नामदेव (सोनी) द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने विभाग के उन आदेशों को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें उनके पिता के सेवा लाभों के भुगतान से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिवादियों को 60 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता के पिता, स्वर्गीय प्रभात कुमार नामदेव, नरसिंहपुर जिला न्यायालय में चालक के पद पर कार्यरत थे। सेवा के दौरान 9 मई 2024 को उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी का पहले ही देहांत हो चुका था, जिसके बाद उन्होंने 2016 में अपनी बेटी (याचिकाकर्ता) को आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड में नामांकित (Nominee) किया था।

पिता की मृत्यु के बाद, विभाग ने याचिकाकर्ता को भविष्य निधि (GPF) और समूह बीमा योजना की राशि तो दे दी, लेकिन अनुग्रह राशि और लीव एनकैशमेंट के दावों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि एक विवाहित बेटी इन लाभों की पात्र नहीं है।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील श्री दुर्गेश कुमार सिंगरोरे ने दलील दी कि यह इनकार संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि जब विभाग ने अन्य लाभों के लिए बेटी को वैध वारिस और नामांकित व्यक्ति मान लिया है, तो शेष लाभों को केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर रोकना तर्कहीन है। उन्होंने हाईकोर्ट की बड़ी पीठ द्वारा मीनाक्षी दुबे बनाम एमपी पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि विवाहित बेटी को अनुकंपा नियुक्ति या अन्य लाभों से बाहर रखना असंवैधानिक है।

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दूसरी ओर, हाईकोर्ट प्रशासन और शासन की ओर से श्री शोभितादित्य ने दलील दी कि यह आदेश प्रचलित नीतियों और सरकारी अधिसूचनाओं के अनुसार दिए गए हैं। उनका कहना था कि नीति के तहत विवाहित बेटी अनुग्रह राशि की पात्र श्रेणियों में शामिल नहीं है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

खंडपीठ ने मीनाक्षी दुबे (सुप्रा) मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि:

“किसी महिला नागरिक को केवल लिंग के आधार पर अनुकंपा के आधार पर किसी भी नियुक्ति के लिए बाहर नहीं किया जा सकता है। बेटी शादी के बाद भी परिवार का हिस्सा बनी रहती है और उसे उसके पिता के परिवार से संबंधित नहीं माना जाना गलत होगा।”

लीव एनकैशमेंट के संबंध में हाईकोर्ट ने इसे अनुच्छेद 300-A के तहत ‘संपत्ति’ का अधिकार माना। भास्कर रामचंद्र जोशी बनाम मप्र राज्य (2013) का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि सेवानिवृत्ति के देय लाभों से किसी को केवल कानून की उचित प्रक्रिया के माध्यम से ही वंचित किया जा सकता है।

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1972 की सरकारी अधिसूचना का विश्लेषण करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अन्य वारिस मौजूद नहीं है, तो विवाहित बेटी को अनुग्रह राशि से वंचित करने का कोई प्रावधान नहीं है। अनुग्रह राशि के उद्देश्य पर टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा:

“अनुग्रह राशि का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल वित्तीय राहत प्रदान करना है… यह राशि कर्मचारी के अंतिम संस्कार और तत्काल आवश्यकताओं के लिए होती है, इसलिए इसे इस आधार पर नहीं नकारा जा सकता कि विवाहित बेटी इसका दावा नहीं कर सकती।”

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मृतक कर्मचारी की अनुग्रह राशि और लीव एनकैशमेंट का भुगतान उसके कानूनी वारिसों को किया जाना चाहिए, चाहे वे विवाहित हों या नहीं। अदालत ने विभाग के पुराने आदेशों को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता को 60 दिनों के भीतर भुगतान सुनिश्चित करने का आदेश दिया।

  • केस का नाम: प्रसन्ना नामदेव (सोनी) बनाम मध्यप्रदेश हाईकोर्ट एवं अन्य
  • केस संख्या: रिट याचिका संख्या 37546/2024

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