मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का सख्त रुख: हाईकोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करने वाले ट्रायल जज के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच के आदेश

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक निचली अदालत के न्यायाधीश द्वारा हाईकोर्ट के आदेशों की कथित अवहेलना पर कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया ने 17 फरवरी, 2026 को पारित अपने आदेश में टिप्पणी की कि ट्रायल जज ने हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है। अदालत ने इस मामले को आवश्यक अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला (MCC No. 39/2022) अशोक कुमार और अन्य द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 39 नियम 2A के तहत दायर किया गया था। आवेदकों का आरोप था कि हाईकोर्ट द्वारा 15 मार्च, 2013 को दिए गए ‘यथास्थिति’ (Status Quo) के अंतरिम आदेश का प्रतिवादियों ने उल्लंघन किया है। आवेदकों के अनुसार, कोर्ट के आदेश के बावजूद विवादित संपत्ति पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया था।

4 अप्रैल, 2024 को हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने आदेश दिया था कि इस उल्लंघन के आरोपों की जांच और साक्ष्यों की आवश्यकता है। इसके लिए ट्रायल कोर्ट को चार महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया था।

ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल

कोर्ट के आदेश के अनुसार, ट्रायल जज को गवाहों के बयान दर्ज करने थे और यह निर्धारित करना था कि क्या वास्तव में कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ है। हालांकि, आदेश के डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी जांच पूरी नहीं की गई। हाईकोर्ट ने पाया कि न्यायिक जांच करने के बजाय, ट्रायल जज ने लोक निर्माण विभाग (PWD) के कार्यपालन यंत्री से एक ‘स्पॉट निरीक्षण रिपोर्ट’ प्राप्त की और उसे ही हाईकोर्ट भेज दिया।

इसके अतिरिक्त, ट्रायल जज ने यह रिपोर्ट सीधे हाईकोर्ट को भेजी, जबकि नियमानुसार इसे प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के माध्यम से भेजा जाना चाहिए था।

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हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया ने ट्रायल जज की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा:

“यह एक ऐसा मामला है जहां ट्रायल जज ने इस कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है।”

ट्रायल जज द्वारा दी गई माफी और स्पष्टीकरण को कोर्ट ने असंतोषजनक पाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“ट्रायल जज द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है क्योंकि उन्होंने रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पहले गवाहों के साक्ष्य दर्ज न करने का कोई कारण नहीं बताया है… इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट ने मामले को काफी लंबे समय तक लंबित रखा।”

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कोर्ट का निर्णय और निर्देश

निचली अदालत के जज के “लापरवाह” आचरण को देखते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:

  1. अनुशासनात्मक कार्रवाई: हाईकोर्ट कार्यालय को निर्देश दिया गया है कि वह आदेश-पत्रिकाओं (Order-sheets), प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की जांच रिपोर्ट और संबंधित जज के स्पष्टीकरण की प्रतियां रजिस्ट्रार जनरल को भेजें। इन्हें माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष “आवश्यक जानकारी और अनुशासनात्मक कार्रवाई” के विचारार्थ रखा जाएगा।
  2. मामले का हस्तांतरण: भिंड के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को यह मामला किसी अन्य सिविल जज को सौंपने का निर्देश दिया गया है ताकि पूर्व में दिए गए निर्देशों के अनुसार निष्पक्ष जांच हो सके।
  3. नई जांच: नई अदालत को चार महीने के भीतर जांच पूरी करनी होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PWD की पिछली रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जाएगा क्योंकि वह पार्टियों की अनुपस्थिति में तैयार की गई थी।
  4. व्यक्तिगत उपस्थिति: सभी पक्षों को 17 मार्च, 2026 को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, भिंड के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
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हाईकोर्ट अब इस मामले पर 20 अगस्त, 2026 को अगली सुनवाई करेगा।

मामले का विवरण

  • केस का शीर्षक: अशोक कुमार और अन्य बनाम श्रीमती मीरा देवी
  • केस संख्या: एम.सी.सी. नंबर 39/2022
  • पीठ: जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया
  • आदेश की तिथि: 17-02-2026
  • आवेदकों के वकील: श्री आनंद वी. भारद्वाज
  • प्रतिवादी के वकील: श्री अभिषेक सिंह भदौरिया

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