सेवा रिकॉर्ड की पवित्रता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को सुदृढ़ करते हुए, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड को जन्मतिथि का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता, विशेषकर सेवानिवृत्ति के बाद सेवा रिकॉर्ड बदलने के लिए। हाईकोर्ट ने अतिरिक्त कलेक्टर, धार के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिसके तहत आधार कार्ड के आधार पर एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को बहाल किया गया था और परिणामस्वरूप सेवारत कर्मचारी को बिना किसी सुनवाई के नौकरी से निकाल दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला याचिकाकर्ता प्रमिला द्वारा दायर एक रिट याचिका (प्रमिला बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य) से संबंधित है। याचिका में अतिरिक्त कलेक्टर, धार द्वारा 1 सितंबर, 2020 को पारित आदेश और उसके बाद 21 नवंबर, 2020 को जारी सेवा समाप्ति आदेश को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता प्रमिला को एक चयन प्रक्रिया के बाद 19 जून, 2018 को आंगनवाड़ी केंद्र, जामली (अंबापुरा) में ‘आंगनवाड़ी सहायिका’ के पद पर नियुक्त किया गया था। यह पद पिछली सहायिका, हिरलीबाई (प्रतिवादी संख्या 5) के 62 वर्ष की अधिवर्षिता (superannuation) आयु पूरी करने पर 5 मार्च, 2017 को सेवानिवृत्त होने के बाद रिक्त हुआ था। आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड में हिरलीबाई की जन्मतिथि 5 मार्च, 1955 दर्ज थी।
सेवानिवृत्ति के लगभग दो साल बाद, हिरलीबाई ने 26 दिसंबर, 2019 को एक अपील दायर की, जिसमें दावा किया गया कि उनकी वास्तविक जन्मतिथि 1 जनवरी, 1964 है। यह दावा पूरी तरह से उनके आधार कार्ड और वोटर आईडी कार्ड पर आधारित था। अपीलीय प्राधिकारी ने इस अपील को स्वीकार कर लिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें बहाल कर दिया गया और याचिकाकर्ता प्रमिला की सेवाएं तत्काल समाप्त कर दी गईं।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील, श्री अक्षय भोंडे ने तर्क दिया कि अपीलीय प्राधिकारी का आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है, क्योंकि याचिकाकर्ता को प्रभावित पक्ष होने के बावजूद न तो पक्षकार बनाया गया और न ही उसे सुना गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अपील बिना किसी स्पष्टीकरण के दो साल की देरी से दायर की गई थी और जन्मतिथि बदलने के लिए आधार और वोटर आईडी पर भरोसा करना कानूनी रूप से अस्थिर है।
राज्य की ओर से, सरकारी अधिवक्ता श्री अमित भाटिया ने वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता को लेकर प्रारंभिक आपत्ति जताई। गुण-दोष के आधार पर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि विभाग अपीलीय प्राधिकारी के आदेश का पालन करने के लिए बाध्य था, क्योंकि वहां केवल एक ही स्वीकृत पद था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने प्रतिवादियों की आपत्तियों को खारिज कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता को “बिना सुने दंडित” (condemned unheard) किया गया है, जिसके लिए न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक है।
1. सेवा रिकॉर्ड की अंतिमता हाईकोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी संख्या 5 ने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान सेवा रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि को स्वीकार किया था और बिना किसी विरोध के सेवानिवृत्त हुई थीं। न्यायालय ने कहा:
“कानून अच्छी तरह से स्थापित है कि एक कर्मचारी जो सेवा रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि को स्वीकार करता है और इसे अंतिम रूप लेने देता है, उसे सेवानिवृत्ति के बाद इसे चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
2. आधार और वोटर आईडी का साक्ष्य मूल्य सुप्रीम कोर्ट के निर्णय सरोज और अन्य बनाम इफको-टोक्यो जनरल इंश्योरेंस कंपनी और अन्य और इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय राम कृपाल उर्फ चिरकुट बनाम चकबंदी उप निदेशक का हवाला देते हुए, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे दस्तावेज सेवा उद्देश्यों के लिए आयु का प्रमाण नहीं हैं।
“यह स्पष्ट है कि प्रतिवादी संख्या 5 द्वारा भरोसा किए गए आधार कार्ड और वोटर पहचान पत्र को उनकी जन्मतिथि का निर्धारक प्रमाण नहीं माना जा सकता है। ये दस्तावेज स्व-घोषणा के आधार पर तैयार किए जाते हैं और केवल पहचान के उद्देश्यों के लिए हैं।”
न्यायालय ने प्रतिवादी संख्या 5 के दावे की तथ्यात्मक असंभवता पर भी गौर किया। रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों से पता चला कि उनके बेटे की जन्मतिथि 1 जनवरी, 1959 और उनकी बहू की जन्मतिथि 1 जनवरी, 1960 है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि ये तथ्य “स्पष्ट रूप से प्रतिवादी संख्या 5 के वर्ष 1964 में पैदा होने की संभावना को नकारते हैं।”
3. प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हाईकोर्ट ने बिना नोटिस या जांच के याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त करने के लिए अधिकारियों की कड़ी आलोचना की।
“अपीलीय प्राधिकारी को पूरी तरह से पता था कि उक्त पद पर याचिकाकर्ता पहले से ही एक वैध नियुक्ति के तहत कार्यरत थी। इस जानकारी के बावजूद, प्राधिकारी ने उसकी पीठ पीछे अपील का फैसला किया। यह चूक निष्पक्ष प्रक्रिया की जड़ पर प्रहार करती है और आदेश को शून्य (void) बना देती है।”
फैसला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- आदेश रद्द: 1 सितंबर, 2020 और 21 नवंबर, 2020 के आदेशों को रद्द कर दिया गया।
- बहाली: प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता, प्रमिला को सेवा की निरंतरता और काल्पनिक वरिष्ठता (notional seniority) व मौद्रिक लाभों सहित सभी परिणामी लाभों के साथ आंगनवाड़ी सहायिका के रूप में बहाल करें।
- वसूली: न्यायालय ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे प्रतिवादी संख्या 5 (हिरलीबाई) को उनकी अधिवर्षिता तिथि (5 मार्च, 2017) के बाद वेतन और अन्य लाभों के रूप में भुगतान की गई पूरी राशि 6% वार्षिक ब्याज के साथ वसूल करें। यह राशि 60 दिनों के भीतर राज्य के खजाने में जमा की जानी चाहिए।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: प्रमिला बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: रिट पिटीशन नंबर 19295 ऑफ 2020
- कोरम: न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री अक्षय भोंडे
- राज्य के वकील: श्री अमित भाटिया, सरकारी अधिवक्ता
- प्रतिवादी संख्या 5 के वकील: श्री एस.पी. पांडेय

