मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर एक रिट अपील को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया है कि ग्राम, जनपद और जिला पंचायत के कर्मचारी भी राज्य सरकार के कर्मचारियों की तरह ही छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की तिथि का लाभ पाने के हकदार हैं।
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि पंचायत कर्मचारियों को वेतन पुनरीक्षण (Pay Revision) का लाभ देने के लिए अलग तिथि निर्धारित करना मनमाना, भेदभावपूर्ण और ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ (Equal Pay for Equal Work) के सिद्धांत का उल्लंघन है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मुरलीधर शर्मा और अन्य कर्मचारियों (उत्तरदाताओं) से संबंधित है, जो जिला पंचायत, इंदौर के कर्मचारी हैं। शुरुआत में उन्हें 1 जनवरी, 2006 से 5वें वेतन आयोग का लाभ दिया गया था। इसके बाद, 29 जुलाई, 2009 को हुई एक बैठक में निर्णय लिया गया कि उन्हें 1 अप्रैल, 2006 से छठे वेतन आयोग का लाभ दिया जाएगा, और यह लाभ उन्हें प्रदान भी कर दिया गया।
हालाँकि, बाद में राज्य सरकार ने 2 मार्च, 2010 और 18 अप्रैल, 2011 को आदेश जारी किए और जिला व जनपद पंचायत के कर्मचारियों को दिए गए छठे वेतनमान की राशि की वसूली के निर्देश दिए। इसके पालन में, 9 सितंबर, 2011 को बिना किसी सुनवाई का अवसर या कारण बताओ नोटिस दिए, कर्मचारियों से वसूली का आदेश पारित कर दिया गया। इस वसूली और भेदभाव के खिलाफ कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिसे एकल पीठ (Single Bench) ने स्वीकार कर लिया था। इसके खिलाफ राज्य ने यह अपील दायर की थी।
पक्षों की दलीलें
राज्य सरकार (अपीलकर्ता) की ओर से तर्क दिया गया कि पंचायतें स्वतंत्र निकाय हैं और वे पूरी तरह से राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए धन पर निर्भर हैं। राज्य का कहना था कि पंचायतों के पास आय का अपना स्रोत नहीं है और वे ‘अर्ध-शासकीय’ (Semi-Govt) श्रेणी में आती हैं। इसलिए, पंचायत कर्मचारियों को ‘सरकारी कर्मचारी’ नहीं माना जा सकता और उन्हें सरकारी कर्मचारियों के समान लाभ देना अनिवार्य नहीं है।
कर्मचारियों (उत्तरदाताओं) की ओर से अधिवक्ता प्रसन्ना आर. भटनागर ने तर्क दिया कि वसूली का निर्णय “मनमाना, भेदभावपूर्ण और अनुचित” था। उन्होंने कहा कि एक बार जब नियोक्ता ने राज्य सरकार के कर्मचारियों के समान छठे वेतन आयोग का लाभ देने का निर्णय ले लिया था, तो सरकार मनमाने ढंग से इसे वापस नहीं ले सकती।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि “क्या ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत के कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की तिथि के संबंध में राज्य सरकार के कर्मचारियों के बराबर माना जाना चाहिए?”
संविधान के अनुच्छेद 243 और 309 का हवाला देते हुए, कोर्ट ने पाया कि यद्यपि पंचायतें स्व-सरकार (Self-Government) की संस्थाएं हैं, लेकिन राज्य विधानमंडल को सार्वजनिक सेवाओं में भर्ती और सेवा शर्तों को विनियमित करने का अधिकार है। कोर्ट ने नोट किया कि राज्य सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए 1 जनवरी, 2006 से वेतन पुनरीक्षण नियम लागू किए थे, लेकिन पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग ने बिना किसी स्पष्ट शक्ति का खुलासा किए पंचायत कर्मचारियों के लिए यह तिथि 1 अप्रैल, 2013 निर्धारित कर दी।
कोर्ट ने ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट के निम्नलिखित फैसलों का उल्लेख किया:
- सुरिंदर सिंह एवं अन्य बनाम इंजीनियर-इन-चीफ सीपीडब्ल्यूडी (1986): समान कर्तव्यों का पालन करने वाले दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन के हकदार हैं।
- रणधीर सिंह बनाम भारत संघ (1982): दिल्ली पुलिस बल को दिल्ली प्रशासन के अन्य कर्मचारियों की तुलना में कम वेतनमान देना अनुचित है।
- पंजाब राज्य बनाम जगजीत सिंह (2017): यह सिद्धांत अस्थायी कर्मचारियों पर भी लागू होता है यदि वे नियमित कर्मचारियों के समान कार्य कर रहे हैं।
पीठ ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:
“सरकार का उक्त वेतनमान का लाभ किसी अलग तिथि से देने का निर्णय मनमाना, भेदभावपूर्ण, अनुचित और ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत के विपरीत है।”
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को दिया गया वेतन पुनरीक्षण का लाभ कानूनी और वैध था।
कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि कर्मचारियों से कोई वसूली की गई है, तो वह राशि उन्हें 6% ब्याज के साथ वापस की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में कर्मचारियों की ओर से कोई गलती, गलत बयानी या धोखाधड़ी नहीं थी।
केस डीटेल्स:
- केस का नाम: मध्य प्रदेश राज्य और अन्य बनाम मुरलीधर शर्मा और अन्य
- केस नंबर: रिट अपील संख्या 237/2022
- कोरम: जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी
- अपीलकर्ता के वकील: श्री सुदीप भार्गव (उप महाधिवक्ता)
- उत्तरदाताओं के वकील: श्री प्रसन्ना आर. भटनागर

