मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इंस्टाग्राम द्वारा एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन (E2EE) समाप्त करने के फैसले को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को पहले ‘भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड’ (Data Protection Board of India) के समक्ष अपनी बात रखने को कहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत गठित इस वैधानिक निकाय को अदालत के हस्तक्षेप से पहले मामले की सुनवाई करनी चाहिए।
यह मामला एक जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है जिसमें मेटा (Meta) के स्वामित्व वाले इंस्टाग्राम के उस नोटिस को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया है कि 8 मई, 2026 के बाद प्लेटफॉर्म पर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन सपोर्ट नहीं किया जाएगा। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह नीतिगत बदलाव संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। हालांकि, हाईकोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या याचिकाकर्ता को सीधे अदालत आने के बजाय डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 के तहत उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपचार का उपयोग करना चाहिए।
इंदौर के स्थानीय वकील पार्थ शर्मा द्वारा दायर इस याचिका में इंस्टाग्राम के उस नोटिफिकेशन को निशाना बनाया गया है जिसमें उपयोगकर्ताओं को सूचित किया गया था: “8 मई, 2026 के बाद इंस्टाग्राम पर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग का समर्थन नहीं किया जाएगा।”
इंस्टाग्राम वर्तमान में एन्क्रिप्शन की सुविधा देता है जो यह सुनिश्चित करता है कि संदेश केवल भेजने वाला और प्राप्त करने वाला ही पढ़ सके। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से इस सुरक्षा फीचर को बंद होने से रोकने की मांग की और दलील दी कि नागरिकों की गोपनीयता की रक्षा के लिए यह अनिवार्य है।
याचिकाकर्ता के तर्क: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन को हटाना निजता के अधिकार पर सीधा प्रहार है। उन्होंने कहा कि एन्क्रिप्शन के बिना निजी संवाद निगरानी (surveillance) और अनधिकृत पहुंच के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं, जो अनुच्छेद 21 के तहत दी गई सुरक्षा का उल्लंघन है।
प्रतिवादी (भारत संघ) के तर्क: केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने याचिका की स्वीकार्यता पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “वर्तमान याचिका जनहित याचिका (PIL) के दायरे में नहीं आती है।”
इसके अलावा, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने संसद द्वारा स्थापित वैधानिक तंत्र की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत गठित विशेष प्राधिकरण ‘डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड’ से संपर्क किए बिना ही यह याचिका सीधे हाईकोर्ट में दायर कर दी गई है।
इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने वैधानिक ढांचे से जुड़ी दलीलों पर विचार किया। कोर्ट का ध्यान मुख्य रूप से डीपीडीपी एक्ट, 2023 की धारा 18 पर था, जो डेटा सुरक्षा और गोपनीयता से संबंधित शिकायतों के निपटारे के लिए ‘डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड’ की स्थापना का प्रावधान करती है।
कोर्ट ने पाया कि चूंकि इस तरह के मामलों से निपटने के लिए एक समर्पित वैधानिक बोर्ड मौजूद है, इसलिए याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट से असाधारण राहत मांगने से पहले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।
निजता के अधिकार से जुड़ी याचिकाकर्ता की मेरिट पर कोई टिप्पणी किए बिना, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड के पास जाने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“प्रतिवादी नंबर 1 के वरिष्ठ वकील की उपरोक्त दलीलों को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता के अन्य तर्कों पर विचार किए बिना, हम याचिकाकर्ता को आज से सात दिनों के भीतर 2023 के अधिनियम की धारा 18 के तहत गठित बोर्ड से संपर्क करने का निर्देश देते हैं।”
8 मई की समय-सीमा को देखते हुए कोर्ट ने बोर्ड के लिए एक सख्त शेड्यूल भी तय किया:
“यदि ऐसी कोई प्रस्तुति (representation) दायर की जाती है, तो बोर्ड कानून के अनुसार याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देने के बाद 6 मई, 2026 से पहले अगले 15 दिनों के भीतर एक तर्कसंगत और स्पष्ट आदेश पारित कर निर्णय लेगा।”
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को बोर्ड के अंतिम फैसले को अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 6 मई, 2026 को तय की गई है।

