सार्वजनिक नोटिस का जवाब देने के लिए नाबालिग बाध्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने एकतरफा उत्तराधिकार प्रमाणपत्र किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने एकतरफा (ex-parte) जारी किए गए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (succession certificate) को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी नाबालिग से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सार्वजनिक नोटिस का जवाब देगा या स्वतंत्र रूप से कानूनी कार्यवाही शुरू करेगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि नाबालिग कानूनी वारिस के बारे में जानकारी होने के बावजूद उसके लिए कानूनी अभिभावक नियुक्त न करना एक गंभीर कानूनी त्रुटि है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मध्य प्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के सेवानिवृत्त लाइनमैन श्री ओमप्रकाश माहेश्वरी की 4 अप्रैल, 2011 को हुई मृत्यु के बाद शुरू हुआ। उनकी बेटियों, रेनू और ज्योति माहेश्वरी ने अपने पिता के सेवानिवृत्ति लाभ प्राप्त करने के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 के तहत आवेदन किया। उन्होंने दावा किया कि उनकी माँ आशा माहेश्वरी की मृत्यु 2006 में ही हो चुकी थी।

बिजली कंपनी ने इस आवेदन का विरोध करते हुए कहा कि आधिकारिक रिकॉर्ड में मृतक की पत्नी का नाम श्रीमती मालती माहेश्वरी दर्ज है। इसके बावजूद, ट्रायल कोर्ट ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी कर दिया। इसके बाद, श्रीमती मालती माहेश्वरी और उनके पुत्र दीपेश माहेश्वरी (जो उस समय नाबालिग थे) की ओर से सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश IX नियम XIII के तहत इस प्रमाणपत्र को रद्द करने के लिए आवेदन किया गया, क्योंकि उन्हें उचित रूप से पक्षकार नहीं बनाया गया था।

शिवपुरी के प्रथम सिविल जज ने इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसे बाद में जिला जज और ग्वालियर हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। निचली अदालतों का तर्क था कि चूंकि सार्वजनिक नोटिस जारी किया गया था और मालती माहेश्वरी पहले एक अपील में वकील के माध्यम से पेश हुई थीं, इसलिए वे अब एकतरफा आदेश को चुनौती नहीं दे सकतीं।

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कानूनी मुद्दे और दलीलें

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या नाबालिग वारिस के अधिकारों के संदर्भ में आदेश IX नियम XIII के आवेदन को खारिज करना कानूनी रूप से सही था। हाईकोर्ट ने पहले यह टिप्पणी की थी कि अपीलकर्ता नंबर 1 (दीपेश) आवश्यक पक्षकार नहीं था क्योंकि उसने शुरुआत में कोई दावा पेश नहीं किया था और नोटिस की कमियों से उस पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जब कार्यवाही शुरू हुई थी, तब दीपेश की उम्र मात्र 12 वर्ष थी। कोर्ट ने नीरजा रियल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम जांगलू और परिमल बनाम वीणा जैसे मामलों का हवाला देते हुए जांच की कि क्या समन “विधिवत तामील” किए गए थे और क्या पक्षकार के पास पेश न होने का “पर्याप्त कारण” था।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के निष्कर्षों को “पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण और विकृत” पाया। जस्टिस करोल ने फैसले में कई महत्वपूर्ण कमियों को रेखांकित किया:

  1. नाबालिग की कानूनी अक्षमता: कोर्ट ने कहा कि नाबालिग सार्वजनिक नोटिस का जवाब देने या स्वयं को पक्षकार बनाने के लिए कानूनी रूप से अक्षम था। पीठ ने कहा, “एक नाबालिग से सार्वजनिक नोटिस का जवाब देने या स्वतंत्र रूप से कानूनी कार्यवाही शुरू करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।”
  2. अभिभावक की नियुक्ति न करना: कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि प्रतिवादी नाबालिग के वारिस होने के तथ्य से पूरी तरह वाकिफ थे। “ऐसी जानकारी के बावजूद, कार्यवाही में नाबालिग का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक वैध अभिभावक की नियुक्ति सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए।”
  3. त्रुटिपूर्ण सार्वजनिक नोटिस: जारी किए गए सार्वजनिक नोटिस में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख नहीं था कि कार्यवाही ओमप्रकाश माहेश्वरी की मृत्यु के संबंध में है।
  4. तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना: कोर्ट ने पाया कि नाबालिग की माँ (मृतक की पत्नी) को गलत तरीके से किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के रूप में वर्णित किया गया था। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 383 के तहत, यदि भौतिक तथ्यों को छिपाया जाता है या गलत बताया जाता है, तो प्रमाण पत्र रद्द किया जा सकता है।
  5. आदेश IX नियम XIII का दायरा: पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 96 CPC और आदेश IX नियम XIII के तहत कार्यवाहियों का दायरा अलग है, जिसमें बाद वाला प्रावधान एकतरफा डिक्री को रद्द करने के लिए “व्यापक क्षेत्राधिकार” प्रदान करता है।
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कोर्ट ने कहा, “यह निष्कर्ष कि नाबालिग पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा, कानून की दृष्टि में टिकने योग्य नहीं है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट और निचली अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया। उत्तराधिकार प्रमाणपत्र देने वाले एकतरफा आदेश को खारिज कर दिया गया है और मामले को उसके मूल नंबर पर बहाल कर दिया गया है।

सभी पक्षों को सक्षम न्यायालय के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया गया है। यह मामला 2011 से लंबित होने के कारण, सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह मामले का निपटारा प्राथमिकता के आधार पर, अधिमानतः एक वर्ष के भीतर करे।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: दीपेश माहेश्वरी और अन्य बनाम रेनू माहेश्वरी और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर ___ / 2026 (SLP (C) नंबर 11006/2021 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
  • फैसले की तारीख: 1 अप्रैल, 2026

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