मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि केवल बाद में एफआईआर (FIR) दर्ज होना या अंतिम रिपोर्ट (Final Report) दाखिल होना, पहले से दी गई अग्रिम जमानत को रद्द करने का पर्याप्त आधार नहीं है। न्यायमूर्ति संजीव एस. कलगांवकर की पीठ ने कहा कि जब तक न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करने वाली “ठोस और प्रबल परिस्थितियां” (Cogent and overwhelming circumstances) सामने नहीं आतीं, तब तक यांत्रिक रूप से जमानत रद्द नहीं की जानी चाहिए।
कोर्ट ने यह टिप्पणी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 483(3) और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439(2) के तहत दायर एक याचिका को खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी (आरोपी) की अग्रिम जमानत रद्द करने की मांग की थी, यह तर्क देते हुए कि उसने जमानत की शर्तों का उल्लंघन कर एक और अपराध किया है।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रतिवादी, मेहरबान सिंह को को-ऑर्डिनेट बेंच द्वारा 16 मार्च, 2023 को पुलिस थाना सुसनेर, जिला आगर मालवा में दर्ज अपराध क्रमांक 414/2022 के मामले में अग्रिम जमानत दी गई थी। यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास), 325, 294, 506, 34 और 302 सहित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के विभिन्न प्रावधानों के तहत दर्ज किया गया था।
याचिकाकर्ता रोहित कुमार ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि जमानत पर रिहा होने के बाद, मेहरबान सिंह ने एक और अपराध किया। मेहरबान सिंह और एक अन्य सुज्जन सोंदिया के खिलाफ बीएनएस (BNSS), 2023 की धारा 296, 351(2), और 3(5) तथा एससी/एसटी एक्ट के तहत नई एफआईआर (अपराध क्रमांक 205/2025) दर्ज की गई।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि 16 मार्च, 2023 का अग्रिम जमानत आदेश सीआरपीसी की धारा 438(2) में उल्लिखित शर्तों के अधीन था। उन्होंने कहा कि आरोपी ने बाद में अपराध करके इन शर्तों का उल्लंघन किया है, इसलिए उसकी जमानत रद्द की जानी चाहिए।
इसके विपरीत, प्रतिवादी मेहरबान सिंह के वकील ने तर्क दिया कि याचिका आधारहीन है। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता रोहित कुमार का परीक्षण (examination) 22 जुलाई, 2023 को पीडब्ल्यू-1 (PW1) के रूप में हो चुका है और उसने अपने साक्ष्य में किसी भी धमकी का आरोप नहीं लगाया है। प्रतिवादी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले भूरी बाई बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि “केवल बाद में एफआईआर दर्ज होना या अंतिम रिपोर्ट दाखिल करना पहले से दी गई जमानत को रद्द करने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि ठोस आधार न बनाए जाएं और मुकदमे में हस्तक्षेप की स्पष्ट संभावना न हो।”
राज्य के वकील ने कोर्ट को सूचित किया कि पूर्व के मामले में सुनवाई चल रही है और बाद के अभियोजन (अपराध क्रमांक 205/2025) में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
न्यायमूर्ति कलगांवकर ने जमानत रद्द करने से संबंधित कानूनी सिद्धांतों की जांच की और सुप्रीम कोर्ट के दौलत राम बनाम हरियाणा राज्य (1995) के फैसले का उल्लेख किया। कोर्ट ने दोहराया कि शुरुआती स्तर पर जमानत खारिज करना और पहले से दी गई जमानत को रद्द करना, दो अलग-अलग आधारों पर विचार किए जाने वाले विषय हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“पहले से दी गई जमानत को रद्द करने के आदेश के लिए बहुत ही ठोस और प्रबल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। आम तौर पर, जमानत रद्द करने के आधार हैं: न्याय प्रशासन के उचित क्रम में हस्तक्षेप या हस्तक्षेप का प्रयास, या न्याय की प्रक्रिया से बचने का प्रयास, या आरोपी द्वारा किसी भी तरह से दी गई रियायत का दुरुपयोग।”
पीठ ने सीबीआई बनाम सुब्रमण्यम गोपालकृष्णन (2011) और भूरी बाई (2022) के मामलों का भी उल्लेख किया और जोर दिया कि जमानत रद्द करने की शक्ति का उपयोग आरोपी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही (disciplinary proceedings) के रूप में नहीं किया जा सकता।
मौजूदा मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए, कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता यह समझाने में विफल रहा कि बाद के मामले में प्रतिवादी के आचरण के कारण किस गवाह को प्रभावित किया गया। कोर्ट ने कहा:
“ऐसा कोई भी तथ्य सामने नहीं आया है जो जमानत की शर्तों के जानबूझकर उल्लंघन या कथित अपराध से संबंधित किसी अन्य बाद की परिस्थिति (supervening circumstance) का सुझाव देता हो, जिसके आधार पर जमानत रद्द की जा सके। बाद के अपराध में अभियोजन की सत्यता का निर्धारण मुकदमे में साक्ष्य के बाद किया जाएगा।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि अग्रिम जमानत रद्द करने के लिए कोई मामला नहीं बनता है। कोर्ट ने हिमांशु शर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2024) के मामले पर भी भरोसा जताया और याचिका को खारिज कर दिया।
केस का विवरण:
केस टाइटल: रोहित कुमार बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य
केस नंबर: विविध आपराधिक मामला (MCRC) संख्या 48726/2025
कोरम: न्यायमूर्ति संजीव एस. कलगांवकर

