मद्रास हाईकोर्ट ने रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के उस कदम को रद्द कर दिया है, जिसके तहत उसने अपनी एक महिला कर्मचारी के अनुसूचित जनजाति (एसटी) प्रमाण पत्र की नए सिरे से जांच शुरू करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी कर्मचारी के जाति प्रमाण पत्र की सत्यता गुण-दोष के आधार पर पहले ही तय हो चुकी हो, तो बिना किसी नए साक्ष्य या ठोस आधार के उस मामले को दोबारा नहीं खोला जा सकता।
न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती की पीठ ने अगस्त 2021 के आरपीएफ के निर्देश को निरस्त करते हुए कहा कि हालांकि राज्य स्तरीय जांच समिति को जनजातीय प्रमाण पत्रों की जांच का सामान्य अधिकार प्राप्त है, लेकिन जहां अदालत या सक्षम समिति द्वारा मामले की मेरिट पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जा चुका हो, वहां दोबारा जांच की अनुमति नहीं है। पीठ ने पाया कि 2006 के न्यायिक फैसले के बाद न तो कोई नया तथ्य सामने आया है और न ही कोई नई शिकायत मिली है, जिससे महिला के जातिगत दर्जे पर संदेह करने की कोई वजह बनती हो।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि इस पूरे विवाद की शुरुआत महिला के पति द्वारा वैवाहिक कलह के दौरान की गई शिकायत से हुई थी। वहीं, स्कूली दस्तावेजों में जाति का उल्लेख न होने को लेकर पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में जाति का कॉलम खाली छूटना दरअसल माता-पिता की निरक्षरता और उस सामाजिक पिछड़ेपन को दर्शाता है, जिसका सामना महिला ने किया था। इसी पिछड़ेपन के चलते वह काफी समय बाद, वर्ष 1989 में जाकर ही प्रमाण पत्र बनवा सकी थी।
दशकों पुराना कानूनी विवाद
इस मामले की पृष्ठभूमि तीन दशक से भी अधिक पुरानी है। मायलापुर के तहसीलदार ने 26 जून 1989 को महिला को कट्टुनायकन समुदाय की सदस्य के रूप में अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र जारी किया था। इसी दस्तावेज के आधार पर 27 सितंबर 1990 को उसकी नियुक्ति आरपीएफ में जूनियर क्लर्क के पद पर हुई थी।
वैवाहिक विवाद के दौरान पति की शिकायत के बाद जिला कलेक्टर ने मामले की जांच की और स्कूली दस्तावेजों में जाति का पुख्ता प्रमाण न मिलने का हवाला देते हुए अप्रैल 1992 में उसका प्रमाण पत्र रद्द कर दिया। इस आदेश के खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जहां अक्टूबर 1999 में एकल पीठ ने कलेक्टर के रद्दीकरण आदेश को खारिज कर दिया।
गुण-दोष के आधार पर अंतिम निर्णय
इसके बाद नवंबर 2006 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को सही ठहराया। खंडपीठ ने महिला के चाचा के आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड, जिसमें उन्हें कट्टुनायकन समुदाय का दर्ज किया गया था, और उसके माता-पिता के उसी समुदाय से संबंधित होने के साक्ष्यों को स्वीकार करते हुए उसके दावे पर मुहर लगाई थी।
इस स्पष्ट न्यायिक आदेश के बावजूद, आरपीएफ ने अगस्त 2021 में निर्धारित प्रक्रिया का हवाला देते हुए उसके प्रमाण पत्र को राज्य स्तरीय जांच समिति के पास नए सिरे से सत्यापन के लिए भेज दिया। महिला ने आरपीएफ के इस कदम को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में दलील दी कि जिस मामले को खंडपीठ मेरिट के आधार पर अंतिम रूप से तय कर चुकी है, उसे बिना किसी नए आधार के दोबारा नहीं उठाया जा सकता।
महिला की दलीलों से सहमति जताते हुए न्यायमूर्ति भरत चक्रवर्ती ने फैसला सुनाया कि 2006 का खंडपीठ का आदेश उसके एसटी दर्जे को अंतिम रूप से स्थापित कर चुका है, लिहाजा आरपीएफ के पास नए सिरे से जांच शुरू करने का कोई कानूनी आधार शेष नहीं है।

