मद्रास हाईकोर्ट: दत्तक पुत्र की उपस्थिति में दूर के वारिसों का संपत्ति में ‘कैविएटेबल इंटरेस्ट’ नहीं, 13 साल की देरी से दायर प्रोबेट निरस्तीकरण याचिका खारिज

मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 13 साल पुराने प्रोबेट (वसीयत का प्रमाणन) को रद्द करने की मांग वाली अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) के तहत यह याचिका समय-बाधित (Time-barred) थी और चूंकि मृतक का एक वैध दत्तक पुत्र मौजूद था, इसलिए दूर के रिश्तेदारों का मामले में कोई ‘कैविएटेबल इंटरेस्ट’ (Caveatable Interest/आपत्ति करने का अधिकार) नहीं बनता है।

जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस के. कुमारेश बाबू की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि अपीलकर्ताओं ने पिछली कानूनी कार्यवाहियों में दत्तक ग्रहण की बात स्वीकार की थी, इसलिए अब वे प्रोबेट निरस्तीकरण याचिका में इस मुद्दे को दोबारा नहीं उठा सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील (OSA.No. 61 of 2023) एकल न्यायाधीश के 10 मार्च, 2022 के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।

मूल याचिका (O.P.No. 638 of 2008) प्रतिवादी टी.एस. प्रकाश चंद गंग द्वारा मीना बाई की 16 मई, 1990 की वसीयत के प्रोबेट के लिए दायर की गई थी। मीना बाई का निधन 17 दिसंबर, 1998 को हुआ था, जबकि उनके पति के.सी. मानिक चंद का निधन 1989 में ही हो गया था। दंपति की कोई जैविक संतान नहीं थी, लेकिन उन्होंने 26 सितंबर, 1990 को पंजीकृत दत्तक विलेख (Adoption Deed) के माध्यम से दूसरे प्रतिवादी, पी. ज्ञानचंद को गोद लिया था।

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हाईकोर्ट ने 10 फरवरी, 2009 को वसीयत का प्रोबेट प्रदान कर दिया था। इसके लगभग 13 साल बाद, 2022 में, अपीलकर्ताओं—श्रीमती लीला कुमारी (मीना बाई के पति के भाई के बेटे की विधवा) और एच. निर्मल चंद—ने प्रोबेट को रद्द करने के लिए आवेदन दायर किया। एकल न्यायाधीश ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अपीलकर्ताओं के पास कोई कैविएटेबल इंटरेस्ट नहीं है और प्रोबेट कार्यवाही को स्वामित्व के मुकदमे (Title Suit) में नहीं बदला जा सकता।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि दूसरे प्रतिवादी को दत्तक पुत्र बताने वाले दस्तावेज “गढ़े हुए” थे और दत्तक ग्रहण “कभी हुआ ही नहीं था”। उन्होंने यह भी दावा किया कि संपत्ति के स्वामित्व दस्तावेज उनके कब्जे में थे।

अपीलकर्ताओं का कहना था कि टेस्टेट्रिक्स (वसीयतकर्ता) के पति के भाई के बेटे की विधवा और पुत्र होने के नाते, उनका मामले में हित था और उन्हें मूल प्रोबेट याचिका में पक्षकार बनाया जाना चाहिए था।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

  1. पिछली कार्यवाहियों में दत्तक ग्रहण की स्वीकृति: खंडपीठ ने पाया कि एक अलग विभाजन मुकदमे (C.S.No. 167 of 1997) में, अपीलकर्ताओं (जो वहां प्रतिवादी थे) ने लिखित बयान में पक्षकारों के संबंधों को स्वीकार किया था, जिसमें विशेष रूप से पी. ज्ञानचंद को मीना बाई का दत्तक पुत्र बताया गया था।
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कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 8 नियम 5 और ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023’ की धारा 53 का हवाला दिया, जो यह प्रावधान करती है कि स्वीकृत तथ्यों को साबित करने की आवश्यकता नहीं होती है। पीठ ने कहा, “एक बार जब दत्तक ग्रहण के मुद्दे पर कोई विशिष्ट इनकार नहीं किया गया, तो बाद की कार्यवाही में इसे दोबारा नहीं उठाया जा सकता।”

  1. प्रोबेट कार्यवाही का दायरा: कोर्ट ने दोहराया कि प्रोबेट कार्यवाही केवल वसीयत के वैध निष्पादन और सत्यापन की जांच तक सीमित है। पीठ ने कहा, “संपत्ति के स्वामित्व (Title) की जांच नहीं की जा सकती और प्रोबेट के लिए आवेदन को स्वामित्व के मुकदमे में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।”
  2. परिसीमा अवधि (Limitation Period): देरी के संबंध में, कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट 2009 में दिया गया था, जबकि निरस्तीकरण आवेदन 2022 में दायर किया गया, जो कि लगभग 13 साल बाद था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले मिसेज लिनेट फर्नांडीस बनाम मिसेज Gertie Mathias का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि परिसीमा अधिनियम का अनुच्छेद 137 प्रोबेट के निरस्तीकरण आवेदनों पर लागू होता है, जिसकी समय सीमा 3 वर्ष है। कोर्ट ने पाया कि देरी के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था।

  1. कैविएटेबल इंटरेस्ट और दत्तक ग्रहण का प्रभाव: कोर्ट ने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 12 का उल्लेख किया, जो यह स्थापित करती है कि गोद लिए जाने की तारीख से दत्तक बच्चा सभी उद्देश्यों के लिए अपने दत्तक माता-पिता की संतान माना जाता है।
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पीठ ने निष्कर्ष निकाला:

“इस प्रकार दत्तक ग्रहण के कारण, दूसरे प्रतिवादी को टेस्टेट्रिक्स मीना बाई का पुत्र माना जाना चाहिए। अपीलकर्ता, जो कि टेस्टेट्रिक्स के दूर के ‘Class II’ कानूनी वारिस हैं, बाहर हो जाते हैं और वे कैविएटेबल इंटरेस्ट का दावा नहीं कर सकते।”

  1. निरस्तीकरण के आधार: कोर्ट ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 263 की जांच की, जो निरस्तीकरण के लिए “उचित कारण” (जैसे धोखाधड़ी या दोषपूर्ण कार्यवाही) को रेखांकित करती है। पीठ ने पाया कि अपीलकर्ता धारा 263 के तहत कोई भी आधार स्थापित करने में विफल रहे।

परिणामस्वरूप, खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया और अपील को लागत सहित खारिज कर दिया।

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