NI एक्ट की धारा 138 के तहत सजा ‘गंभीर कदाचार’ नहीं; पेंशन नहीं रोकी जा सकती: मद्रास हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने ट्रेजरी और अकाउंट्स विभाग द्वारा दायर एक अपील को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act), 1881 की धारा 138 के तहत दोषसिद्धि को ‘गंभीर कदाचार’ (grave misconduct) या ‘गंभीर अपराध’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस आधार पर तमिलनाडु पेंशन रूल्स, 1978 के तहत किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी की पेंशन को रोकना या बंद करना न्यायसंगत नहीं है।

जस्टिस एन. सतीश कुमार और जस्टिस एम. जोतिरामन की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें चेक बाउंस मामले में दोषी ठहराए गए प्रतिवादी श्रीनिवासन की पेंशन रोकने के विभागीय आदेश को रद्द कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला तब शुरू हुआ जब ट्रेजरी और अकाउंट्स विभाग (अपीलकर्ता) ने श्रीनिवासन की पेंशन रोकने का आदेश जारी किया। विभाग का तर्क था कि चूंकि प्रतिवादी को NI एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया है, इसलिए वह पेंशन का हकदार नहीं है। इस कार्रवाई को पहले एकल न्यायाधीश के समक्ष चुनौती दी गई थी, जिन्होंने पेंशन रोकने के आदेश को रद्द कर दिया था। इसके बाद विभाग के निदेशकों ने एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ यह रिट अपील दायर की।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ताओं की ओर से एडिशनल गवर्नमेंट प्लीडर ने दलील दी कि अधिकारियों के पास तमिलनाडु पेंशन रूल्स, 1978 के नियम 8(b) के तहत कार्रवाई करने की शक्ति है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि कोई पेंशनभोगी “गंभीर कदाचार” का दोषी पाया जाता है, तो सक्षम प्राधिकारी के पास उसकी पेंशन को आंशिक या पूर्ण रूप से रोकने का अधिकार है। विभाग का कहना था कि NI एक्ट के तहत दोषसिद्धि इसी श्रेणी में आती है।

वहीं, प्रतिवादी के वकील श्री आर. करुणानिधि ने तर्क दिया कि NI एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध की प्रकृति भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत आने वाले नैतिक अधमता (moral turpitude) के अपराधों से पूरी तरह अलग है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

कोर्ट ने पेंशन नियमों के दायरे और NI एक्ट के तहत अपराधों की प्रकृति का बारीकी से परीक्षण किया। सुप्रीम कोर्ट के कौशल्या देवी मसनद बनाम रूपकिशोर खरे (2011) के फैसले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा:

“निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 के तहत शिकायत की गंभीरता को भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों या अन्य आपराधिक अपराधों के बराबर नहीं रखा जा सकता है। धारा 138 के तहत अपराध लगभग एक नागरिक दोष (civil wrong) की प्रकृति का है, जिसे आपराधिक रंग दिया गया है।”

हाईकोर्ट ने मंजुला बनाम तमिलनाडु राज्य (2016) के एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि धारा 138 एक व्यावसायिक लेन-देन से जुड़ा मामला है और इसे नैतिक अधमता वाला अपराध नहीं माना जा सकता।

तमिलनाडु पेंशन रूल्स की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा:

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“तमिलनाडु पेंशन रूल्स, 1978 का नियम 8(b) केवल तब लागू होता है जब सजा किसी गंभीर अपराध में हो, जो ‘गंभीर कदाचार’ की श्रेणी में आता हो। इसलिए, उक्त नियम को व्यावसायिक लेनदेन से संबंधित अपराध के लिए लागू नहीं किया जा सकता है।”

फैसला

खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि अधिकारी NI एक्ट के तहत व्यावसायिक लेनदेन से उत्पन्न दोषसिद्धि के आधार पर नियम 8(b) का सहारा लेकर पेंशन नहीं रोक सकते। कोर्ट ने अपील में कोई दम न पाते हुए रिट अपील को खारिज कर दिया और संबंधित याचिकाओं को भी बंद कर दिया।

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मामले का विवरण

  • केस टाइटल: द डायरेक्टर, ट्रेजरी एंड अकाउंट्स डिपार्टमेंट व अन्य बनाम श्रीनिवासन
  • केस नंबर: W.A(MD)No. 250 of 2026 और C.M.P.(MD) No.2721 of 2026
  • तारीख: 5 मार्च, 2026
  • बेंच: जस्टिस एन. सतीश कुमार और जस्टिस एम. जोतिरामन
  • वकील: श्री ए. कन्नन, एडिशनल गवर्नमेंट प्लीडर (अपीलकर्ताओं के लिए); श्री आर. करुणानिधि (प्रतिवादी के लिए)

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