वैवाहिक संबंधों में आपसी सहमति “कानूनी रूप से अप्रासंगिक”, पति पर धारा 377 के तहत नहीं चलेगा केस: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि विवाह के अस्तित्व के दौरान पति-पत्नी के बीच होने वाले यौन कृत्य, जिन्हें धारा 375 के तहत ‘रेप’ की विस्तृत परिभाषा में शामिल किया गया है, धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) के दायरे में नहीं आएंगे। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक अपवाद के चलते ऐसे मामलों में ‘सहमति’ का पहलू कानूनी रूप से बेअसर हो जाता है।

मामला और पृष्ठभूमि

यह मामला पति, उसके माता-पिता और बहन (याचिकाकर्ताओं) द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने भिंड के महिला पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर (क्राइम नंबर 21/2023) को रद्द करने की मांग की थी। शिकायतकर्ता (पत्नी) ने आरोप लगाया था कि उसे 6 लाख रुपये और बुलेट मोटरसाइकिल की अतिरिक्त दहेज की मांग के लिए प्रताड़ित किया गया। साथ ही, उसने पति पर शारीरिक और यौन शोषण सहित “अप्राकृतिक कृत्यों” के गंभीर आरोप लगाए थे।

पुलिस ने इस मामले में आईपीसी की धारा 377, 354, 498-A, 323, 294, 506, 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि आरोप “सामान्य और अस्पष्ट” हैं और केवल निजी प्रतिशोध की भावना से लगाए गए हैं। यह भी कहा गया कि ननद (याचिकाकर्ता नंबर 4) के खिलाफ मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज धारा 164 के बयान में कोई विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई थी। बचाव पक्ष का कहना था कि यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप बाद में जोड़कर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, क्योंकि पहले की भरण-पोषण की कार्यवाही (धारा 125) में इनका जिक्र नहीं था।

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वहीं, राज्य और शिकायतकर्ता के वकील ने दलील दी कि आरोप गंभीर हैं और बयानों द्वारा समर्थित हैं। उन्होंने कहा कि साक्ष्यों की सत्यता का फैसला ट्रायल के दौरान होना चाहिए, न कि धारा 482 के तहत शुरुआती स्तर पर।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

ननद के खिलाफ कार्यवाही पर: जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के ने पाया कि ननद के खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“कथित अपराधों में उसकी सक्रिय संलिप्तता दर्शाने वाले किसी भी विशिष्ट आरोप के अभाव में, उसे फंसाना अस्पष्ट है और प्रथम दृष्टया कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होता है।”

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धारा 377 और वैवाहिक अपवाद पर: हाईकोर्ट ने 2013 के संशोधन के बाद आईपीसी की धारा 375 (रेप) की व्याख्या की, जिसमें अब मुख मैथुन और गुदा मैथुन जैसे कृत्यों को भी शामिल किया गया है। कोर्ट ने गौर किया कि जो कृत्य पहले धारा 377 के तहत “अप्राकृतिक अपराध” माने जाते थे, वे अब रेप की परिभाषा में आ गए हैं।

निर्णय के पैरा 17 में नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) और मनीष साहू बनाम मध्य प्रदेश राज्य जैसे मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“…धारा 375 आईपीसी के अपवाद 2 (Exception 2) के आलोक में, एक पति द्वारा अपनी पत्नी (जो नाबालिग न हो) के साथ किए गए यौन संबंध या यौन कृत्य ‘रेप’ की श्रेणी में नहीं आते हैं। इस प्रकार, वैवाहिक संबंधों के भीतर ऐसे कृत्यों के लिए सहमति का पहलू कानूनी रूप से अप्रासंगिक हो जाता है।”

हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि चूंकि ये कृत्य अब ‘रेप’ की परिभाषा में शामिल हैं और वैवाहिक संबंधों को इस धारा से सुरक्षा (Exception) प्राप्त है, इसलिए पति के खिलाफ धारा 377 नहीं लगाई जा सकती:

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“रेप की विस्तृत परिभाषा और वैवाहिक संबंधों के पक्ष में वैधानिक अपवाद को देखते हुए, विवाह के अस्तित्व के दौरान पति-पत्नी के बीच ऐसे कृत्यों के लिए धारा 377 लागू नहीं की जा सकती।”

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:

  1. ननद (याचिकाकर्ता नंबर 4) के खिलाफ एफआईआर और सभी कानूनी कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quashed) कर दिया गया।
  2. पति के खिलाफ धारा 377 के आरोपों को हटा दिया गया
  3. पति और उसके माता-पिता के खिलाफ आईपीसी की अन्य धाराओं (498-A, 354, 323, 294, 506, 34) और दहेज निषेध अधिनियम के तहत मामला जारी रहेगा, क्योंकि ये तथ्यों से जुड़े विवादित विषय हैं जिनका फैसला ट्रायल के दौरान होगा।

केस विवरण:

  • केस नंबर: Misc. Criminal Case No. 23881 of 2024
  • पीठ: जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के
  • आदेश की तिथि: 25 मार्च, 2026

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