मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने निष्पादन न्यायालय (Executing Court) द्वारा कब्जा वारंट जारी करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई किरायेदार लगातार 5 महीनों तक किराये का भुगतान करने में विफल रहता है, तो पूर्व में हुई समझौता डिक्री निष्पादन योग्य (Executable) हो जाती है।
न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि मकान मालिक किराया लेने से बच रहा था, तब भी किरायेदार को कानून द्वारा उपलब्ध विकल्पों, जैसे कि रेंट कंट्रोलिंग अथॉरिटी के पास किराया जमा करना या मनी ऑर्डर के माध्यम से भेजना, का उपयोग करना चाहिए था।
यह मामला श्रीमती सुमन सोनी बनाम श्री राठौर सकल पंच ट्रस्ट खंडवा एवं अन्य से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने निष्पादन न्यायालय द्वारा जारी कब्जा वारंट को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि किराये का बकाया अक्टूबर 2017 में चुका दिया गया था और मकान मालिक जानबूझकर किराया लेने से बच रहा था। वहीं, प्रतिवादी (ट्रस्ट) का कहना था कि किराये में 11 महीने की देरी हुई, जो 2013 की समझौता डिक्री की शर्तों का उल्लंघन है। डिक्री के अनुसार, लगातार 5 महीने किराया न देने पर बेदखली का आदेश प्रभावी होना था।
केस की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता के पति प्रतिवादी ट्रस्ट की एक दुकान में किरायेदार थे। पूर्व में दायर एक बेदखली मुकदमे में 31 अक्टूबर 2013 को एक समझौता डिक्री पारित की गई थी। इसके तहत किराया 800 रुपये प्रति माह तय किया गया था और यह शर्त रखी गई थी कि यदि भविष्य में लगातार 5 महीने तक किराया नहीं दिया गया, तो बेदखली की डिक्री का निष्पादन किया जा सकेगा।
मूल किरायेदार की मृत्यु 15 अक्टूबर 2016 को हुई थी और अंतिम किराया 30 अक्टूबर 2016 तक का जमा था। इसके बाद किराया न मिलने पर मकान मालिक ने 1 मई 2017 को निष्पादन याचिका दायर की।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता के वकील का पक्ष: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि निष्पादन न्यायालय का आदेश कानूनन गलत है। उन्होंने कहा कि मकान मालिक किराया स्वीकार करने से बच रहा था। सबूत के तौर पर एक बैंक स्टेटमेंट पेश किया गया जिसमें दिखाया गया कि 20 सितंबर 2017 को 1,11,040 रुपये का चेक दिया गया था, लेकिन मकान मालिक का खाता ब्लॉक होने के कारण वह बाउंस हो गया। इसलिए इसे जानबूझकर की गई चूक नहीं माना जाना चाहिए।
प्रतिवादी के वकील का पक्ष: प्रतिवादी के वकील ने दलील दी कि किराया केवल अक्टूबर 2016 तक ही दिया गया था। अगला भुगतान सीधे अक्टूबर 2017 में करने का प्रयास किया गया, जो 11 महीने की देरी थी। डिक्री की शर्तों के अनुसार, 5 महीने की चूक 1 अप्रैल 2017 को ही पूरी हो गई थी, जिससे डिक्री निष्पादन योग्य बन गई।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने भुगतान के रिकॉर्ड और 2013 की डिक्री की शर्तों की समीक्षा की। कोर्ट ने पाया कि 5 महीने की चूक की अवधि 1 अप्रैल 2017 को ही समाप्त हो गई थी।
किराया लेने से बचने के दावे पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“भले ही मकान मालिक किराया लेने से बच रहा था, किरायेदार 5 महीने के ‘ब्रीदिंग टाइम’ (राहत अवधि) के भीतर बैंक खाते में चेक जमा कर सकता था, लेकिन उसने अंतिम भुगतान के 11 महीने बाद सितंबर 2017 में चेक जमा किया।”
कोर्ट ने आगे कहा कि किरायेदार ने अन्य कानूनी उपायों का सहारा नहीं लिया:
“मकान मालिक द्वारा किराया लेने से इनकार करने पर, किराया रेंट कंट्रोलिंग अथॉरिटी के समक्ष जमा किया जा सकता था या मनी ऑर्डर द्वारा भेजा जा सकता था, लेकिन किरायेदार ने इस उपलब्ध विकल्प को नहीं चुना।”
पीठ ने यह भी पाया कि सितंबर 2017 में चेक द्वारा भुगतान का प्रयास निष्पादन नोटिस मिलने के बाद किया गया था, जो उस चूक को खत्म नहीं कर सकता जिसके कारण डिक्री पहले ही निष्पादन योग्य हो चुकी थी।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह “किरायेदार द्वारा किराये के भुगतान में चूक और समझौता डिक्री की शर्तों के उल्लंघन का स्पष्ट मामला है।” निष्पादन न्यायालय द्वारा कब्जा वारंट जारी करने के आदेश में कोई त्रुटि न पाते हुए, हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
- केस का नाम: श्रीमती सुमन सोनी बनाम श्री राठौर सकल पंच ट्रस्ट खंडवा एवं अन्य
- केस संख्या: विविध याचिका संख्या 6745/2019

