पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने लुधियाना के दोराहा में साढ़े सात साल की बच्ची के साथ 2019 में हुए रेप और हत्या के मामले में दो दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा रद्द कर दी है। जांच और ट्रायल की प्रक्रिया में गंभीर खामियों का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने मामले को वापस निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) भेज दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि आरोपियों के बयान दर्ज करने के चरण से सुनवाई दोबारा शुरू की जाए और नए सिरे से फैसला सुनाया जाए।
जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने 6 अप्रैल के अपने आदेश में पाया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों के परीक्षण के दौरान डीएनए रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण साक्ष्यों को उनके सामने स्पष्ट रूप से नहीं रखा। हाईकोर्ट के अनुसार, इस चूक ने “अभियुक्तों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव” डाला और पूछताछ के तरीके को “अत्यधिक दोषपूर्ण” बना दिया।
हाईकोर्ट का निर्णय मुख्य रूप से ट्रायल कोर्ट द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 (जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 351 है) का पालन न करने पर आधारित है। यह कानूनी प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि अभियुक्त को उसके खिलाफ आए हर आपत्तिजनक साक्ष्य पर अपना स्पष्टीकरण देने का निष्पक्ष अवसर मिले।
खंडपीठ ने टिप्पणी की, “यह ऐसा मामला नहीं है जहां ट्रायल कोर्ट ने सभी आपत्तिजनक परिस्थितियों को अभियुक्तों के सामने रखा हो।” अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 313 के तहत बयान दर्ज करने का उद्देश्य अभियुक्त को अभियोजन पक्ष के सबूतों में दिख रही परिस्थितियों को समझाने का मौका देना है।
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट ने दोनों को दोषी ठहराने के लिए डीएनए रिपोर्ट पर भारी भरोसा किया, लेकिन वही रिपोर्ट कभी भी अभियुक्तों के सामने उनके स्पष्टीकरण के लिए नहीं रखी गई।
अदालत ने कहा, “डीएनए रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है, और यदि इसे अभियुक्त को धारा 313 के तहत स्पष्टीकरण का अवसर दिए बिना साक्ष्य के रूप में पढ़ा जाता है, तो इससे अभियुक्त के हितों को नुकसान पहुंचना तय है।”
इसके अलावा, पीठ ने पाया कि मेडिकल टीम द्वारा पोस्टमार्टम के दौरान देखी गई यौन हमले और उससे जुड़ी चोटों के बारे में भी आरोपियों से सवाल नहीं पूछे गए थे। बच्ची को ‘लाडली’ के रूप में संबोधित करते हुए अदालत ने कहा:
“लाडली की हत्या रेप के बाद की गई थी, और यदि उसके साथ यौन शोषण न हुआ होता, तो सबूत छिपाने के लिए उसकी हत्या करने का कोई मकसद नहीं होता। इसलिए, मूल रूप से हम रेप के मामले पर विचार कर रहे हैं, और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, यानी पीड़िता के साथ रेप होने का सबूत, आरोपियों के सामने नहीं रखा गया था।”
दोषसिद्धि और मृत्युदंड को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये कमियां “प्रक्रियात्मक अनियमितताएं” हैं जिन्हें “सुधारा जा सकता है।”
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:
- दोनों अभियुक्तों से तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर अलग-अलग छोटे सवाल पूछकर उनकी दोबारा जांच की जाए।
- अभियुक्तों को उचित समय के भीतर अपना बचाव साक्ष्य (defence evidence) पेश करने का अवसर दिया जाए।
- दोनों पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुसार नया फैसला सुनाया जाए।
यह मामला मार्च 2019 में दर्ज हुई एक एफआईआर से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 9 मार्च 2019 को लुधियाना के दोराहा में बच्ची के चचेरे भाई ने उसे अगवा किया था। बाद में एक अन्य सह-आरोपी भी उसके साथ शामिल हो गया और दोनों ने एक सुनसान गोदाम में बच्ची के साथ दुष्कर्म किया। इसके बाद गला दबाकर और सिर पर ईंटों से वार कर उसकी हत्या कर दी गई थी।
निचली अदालत ने 2023 में दोनों पुरुषों को मृत्युदंड सुनाया था, जिसकी पुष्टि के लिए मामला हाईकोर्ट भेजा गया था। दोषियों ने भी अपनी सजा के खिलाफ अपील दायर की थी, जिस पर अब हाईकोर्ट का यह आदेश आया है।

