इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्पष्ट किया है कि स्पेशल एनआईए कोर्ट द्वारा किसी अभियुक्त को डिस्चार्ज करने से इनकार करने के आदेश के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत आवेदन विचारणीय नहीं है। न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने कहा कि इस प्रकार के आदेशों को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) अधिनियम, 2008 की धारा 21(1) के तहत वैधानिक अपील के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक मोहम्मद फैजान और दो अन्य ने हाईकोर्ट में एक आवेदन दाखिल कर लखनऊ स्थित स्पेशल जज एनआईए/अपर सत्र न्यायाधीश के 1 जुलाई 2025 के आदेश को रद्द करने की मांग की थी। स्पेशल कोर्ट ने सत्र मामले (स्टेट बनाम मोहम्मद फैजान एवं अन्य) में आवेदकों को डिस्चार्ज करने से इनकार कर दिया था। यह मामला आईपीसी की धारा 121-A, 153-A और 295-A के तहत बख्शी का तालाब पुलिस स्टेशन, लखनऊ में दर्ज केस अपराध संख्या 342/2022 से संबंधित है। इसके साथ ही आवेदकों ने मजिस्ट्रेट द्वारा लिए गए संज्ञान आदेश और पूरी कार्यवाही को भी चुनौती दी थी।
राज्य सरकार की प्रारंभिक आपत्ति
राज्य की ओर से अपर सरकारी अधिवक्ता (AGA) श्री शिव नाथ तिलहारी ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि एनआईए अधिनियम की धारा 21(1) में स्पष्ट प्रावधान है कि स्पेशल कोर्ट के किसी भी निर्णय, सजा या आदेश (जो अंतरवर्ती आदेश न हो) के खिलाफ केवल हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है।
राज्य ने अपने पक्ष में सलाहुद्दीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022), सुमित कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024), और रविंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) जैसे फैसलों का हवाला दिया। इन मिसालों के आधार पर तर्क दिया गया कि चूंकि यह आदेश अपील योग्य है, इसलिए धारा 482 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग नहीं किया जा सकता।
आवेदकों के तर्क
आवेदकों के वकील श्री आफताब अहमद ने दलील दी कि इस मामले में एनआईए अधिनियम लागू ही नहीं होता क्योंकि जांच उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की गई थी, न कि एनआईए द्वारा। उन्होंने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 6 और 7 के अनुसार, एनआईए द्वारा जांच और अभियोजन की ‘जुड़वां शर्तें’ पूरी होनी चाहिए।
वकील ने यह भी कहा कि चूंकि केंद्र सरकार ने धारा 6(4) के तहत एनआईए को जांच नहीं सौंपी थी और मामला राज्य सरकार द्वारा चलाया जा रहा है, इसलिए इसकी सुनवाई स्पेशल कोर्ट के बजाय नियमित अदालत में होनी चाहिए। उन्होंने पटना हाईकोर्ट के बहादुर कोरा बनाम बिहार राज्य (2015) के फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि एनआईए जांच के अभाव में स्पेशल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं बनता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने एनआईए अधिनियम, 2008 के ढांचे का सूक्ष्म परीक्षण किया। कोर्ट ने नोट किया कि आईपीसी की धारा 121-A अधिनियम की अनुसूची (Schedule) में शामिल एक ‘अनुसूचित अपराध’ (Scheduled Offence) है। अधिनियम की प्रयोज्यता पर कोर्ट ने कहा:
“एनआईए अधिनियम, 2008 के प्रावधान उन दोनों ही मामलों में लागू होंगे जहां जांच एनआईए द्वारा की गई हो या राज्य एजेंसी द्वारा। अधिनियम लागू होने के लिए मुख्य आवश्यकता यह है कि अपराध ‘अनुसूचित अपराध’ की श्रेणी में आना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने धारा 10 का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार के पास अनुसूचित अपराधों की जांच और अभियोजन की स्वतंत्र शक्ति सुरक्षित है। कोर्ट ने आवेदकों की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें अधिनियम के लागू न होने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा:
“चूंकि आदेश स्पेशल जज, एनआईए द्वारा पारित किया गया है, इसलिए अधिनियम की धारा 21(1) के तहत अपील ही होगी। अतः आवेदक के वकील का यह तर्क कि वर्तमान मामले में एनआईए अधिनियम लागू नहीं है, टिकने योग्य नहीं है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 21(1) में ‘अंतरवर्ती आदेश’ (Interlocutory Order) का अपवाद उन आदेशों पर लागू नहीं होता जो अभियुक्त के अधिकारों को प्रभावित करते हैं, जैसे डिस्चार्ज से इनकार करना।
निर्णय
हाईकोर्ट ने आवेदन को अपोषणीय (Not Maintainable) करार देते हुए खारिज कर दिया।
“उपरोक्त चर्चा के आलोक में, यह आवेदन पोषणीय न होने के कारण खारिज किया जाता है। आवेदक के पास अधिनियम की धारा 21(1) के तहत उपचार (Remedy) तलाशने का विकल्प खुला है।”
मामले का विवरण:
- केस : मोहम्मद फैजान और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव गृह, लखनऊ एवं अन्य के माध्यम से
- केस संख्या: आवेदन धारा 482 संख्या 734 वर्ष 2026
- न्यायाधीश: न्यायमूर्ति बृज राज सिंह
- तारीख: 20 मार्च, 2026

