‘लास्ट सीन थ्योरी’ के लिए समय का कम अंतराल अनिवार्य: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 34 साल पुराने हत्या के मामले में दो को बरी किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दो व्यक्तियों की सजा रद्द कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘लास्ट सीन थ्योरी’ (अंतिम बार साथ देखे जाने का सिद्धांत) तब कानूनी रूप से मान्य नहीं होती, जब मृतक को आरोपियों के साथ देखे जाने और शव मिलने के समय के बीच एक लंबा अंतराल हो।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने अनूप सिंह और राम कुमार द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया। इन दोनों को 2005 में सहारनपुर की एक ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह मामला फरवरी 1992 का है। आरोप था कि अनूप सिंह और राम कुमार ने सहारनपुर से चंद्रप्रकाश का अपहरण किया और उसकी हत्या कर दी। हत्या का कारण कथित तौर पर वह ₹7,500 थे जो मृतक ने नौकरी लगवाने के लिए आरोपियों को दिए थे। चंद्रप्रकाश का शव 9 फरवरी 1992 को हरियाणा के बल्लभगढ़ रेलवे स्टेशन के पास मिला था। इस मामले की एफआईआर मृतक के भाई बलदेव सिंह ने 12 फरवरी 1992 को दर्ज कराई थी। सुनवाई के दौरान दो अन्य आरोपी, बालक राम और विनोद की मृत्यु हो गई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील श्री चेतन चटर्जी ने तर्क दिया कि पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (circumstantial evidence) पर आधारित है और कड़ियों की श्रृंखला अधूरी है। उन्होंने घटना की रिपोर्ट करने में पांच दिन की देरी और ‘मकसद’ (पैसे का लेनदेन) को लेकर विरोधाभासों की ओर ध्यान आकर्षित किया। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि मेडिकल साक्ष्यों के अनुसार, मौत चलती ट्रेन से गिरने के कारण हुई दुर्घटना भी हो सकती है।

वहीं, राज्य सरकार के वकील श्री जी. एन. कनौजिया (A.G.A.-I) ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि आरोपियों का मृतक के साथ अंतिम बार देखा जाना उनकी संलिप्तता को साबित करने के लिए पर्याप्त है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के मामलों में परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिए जो पूरी तरह से केवल आरोपी के दोष की ओर इशारा करती हों। कोर्ट ने नोट किया कि मृतक को अंतिम बार 7 फरवरी 1992 की शाम 6:00 बजे देखा गया था, जबकि शव 9 फरवरी 1992 की दोपहर को मिला।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“अंतिम बार साथ देखे जाने का सिद्धांत (last seen theory) तब प्रभावी होता है जब आरोपी और मृतक को जीवित देखे जाने और शव मिलने के बीच का समय अंतराल इतना कम हो कि आरोपी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपराध किए जाने की संभावना असंभव हो जाए।”

शरद बिरधीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य और रामब्रक्ष बनाम छत्तीसगढ़ राज्य जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि लगभग दो दिनों का यह अंतराल साक्ष्य की विश्वसनीयता को कमजोर करता है, क्योंकि इस दौरान किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने आगे कहा:

“इसलिए, इस मामले में लास्ट सीन थ्योरी कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है क्योंकि कानून अंतिम दर्शन और मृत्यु के बीच समय और स्थान की निकटता की मांग करता है। इस मामले में एक महत्वपूर्ण अंतराल मौजूद है जो तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की संभावना को बाहर करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपना मामला बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में विफल रहा है। कोर्ट ने सहारनपुर की ट्रायल कोर्ट द्वारा 24 सितंबर 2005 को दिए गए सजा के आदेश को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया:

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“ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय को रद्द किया जाता है। अपीलकर्ता संख्या 2 और 3, यानी अनूप सिंह और राम कुमार को उन सभी आरोपों से बरी किया जाता है जिनके लिए उन पर मुकदमा चलाया गया था।”

अदालत ने जेल में बंद अपीलकर्ताओं को तुरंत रिहा करने और उनके बेल बॉन्ड को रद्द करने का निर्देश दिया है।

मामले का विवरण:

  • केस का नाम: बालक राम और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4445 वर्ष 2005
  • पीठ: न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय

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