क्या लंबित FIR अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण में बाधा बन सकती है? मद्रास हाईकोर्ट ने मामला बड़ी पीठ को भेजा

मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को सुलझाने के लिए मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित किया है। प्रश्न यह है कि क्या कानून के किसी स्नातक को अधिवक्ता (Advocate) के रूप में पंजीकृत (Enroll) करने से केवल इसलिए रोका जा सकता है क्योंकि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित है? न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति आर. कलैमथी की खंडपीठ ने टिप्पणी की है कि न्यायिक निर्देश ‘अधिवक्ता अधिनियम, 1961’ (Advocates Act, 1961) के तहत बनाए गए नियमों का स्थान नहीं ले सकते।

कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्पष्टता के लिए ‘लार्जर बेंच’ (बड़ी पीठ) के गठन की सिफारिश की है, क्योंकि हाईकोर्ट के पिछले फैसलों में लंबित आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों के पंजीकरण पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए थे, जबकि एडवोकेट्स एक्ट केवल ‘दोषसिद्धि’ (Conviction) को ही अयोग्यता मानता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, एस. भास्करपांडियन ने वर्ष 1984 में अपनी कानून की डिग्री प्राप्त की थी। हालांकि, ग्राम प्रशासनिक अधिकारी (VAO) के रूप में नियुक्त होने के कारण उन्होंने उस समय अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण नहीं कराया। 30 जनवरी 2014 को सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्होंने 23 जुलाई 2014 को बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु के समक्ष पंजीकरण के लिए आवेदन किया।

लेकिन, उनके आवेदन को संसाधित नहीं किया गया क्योंकि उनके खिलाफ दो आपराधिक मामले लंबित थे:

  1. जिला अपराध शाखा, मदुरै में दर्ज अपराध संख्या 28/2013।
  2. कुदल पुधुर पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 94/2014।
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इसके परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता ने बार काउंसिल को उन्हें पंजीकृत करने का निर्देश देने के लिए हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की।

दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले पिछले दस वर्षों से केवल एफआईआर (FIR) के चरण पर ही हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि अभियोजन पक्ष ने अभी तक अंतिम रिपोर्ट (Final Report) भी दाखिल नहीं की है। यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता केवल उन न्यायिक निर्देशों के कारण पंजीकरण कराने में असमर्थ हैं, जो लंबित आपराधिक मामलों वाले व्यक्तियों के पंजीकरण को रोकते हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

खंडपीठ ने एस.एम. अनंत मुरुगन बनाम चेयरमैन (2015) मामले में दिए गए निर्णय का संज्ञान लिया, जहां एक एकल पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया था कि वह लंबित आपराधिक मामलों वाले कानून स्नातकों को तब तक पंजीकृत न करे जब तक कि एडवोकेट्स एक्ट और नियमों में बदलाव नहीं किया जाता। इस निर्देश को बाद में 2017 में एक पूर्ण पीठ (Full Bench) ने भी एक “अस्थायी उपाय” के रूप में पुष्टि की थी।

वैधानिक प्रावधानों पर टिप्पणी: कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लेख किया, जो किसी भी पेशे का अभ्यास करने के अधिकार की गारंटी देता है। इसके बाद कोर्ट ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 24A का विश्लेषण किया, जो पंजीकरण के लिए अयोग्यताओं को सूचीबद्ध करती है। इस धारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति नैतिक अधमता (Moral Turpitude) से जुड़े अपराध में ‘दोषी’ (Convicted) पाया जाता है, तो वह अयोग्य होगा।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

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“हमारा विचार है कि जब एक वैध रूप से पारित कानून प्रभावी है, तो रिट कोर्ट के लिए यह खुला नहीं हो सकता कि वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए अतिरिक्त अयोग्यताएं निर्धारित करे।”

न्यायिक अतिरेक और नियम बनाने की शक्ति: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ (2019) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अदालतें विधायिका के कार्यों को नहीं हड़प सकतीं और अभ्यास पर प्रतिबंध अधिवक्ता अधिनियम या नियमों में स्पष्ट रूप से बताए जाने चाहिए।

खंडपीठ ने एन. संतोष कुमार बनाम बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु और पुडुचेरी (2024) के हालिया आदेश से असहमति जताई, जिसमें यह माना गया था कि एस.एम. अनंत मुरुगन मामले में दिए गए न्यायिक निर्देश को अधिवक्ता अधिनियम की धारा 34 के तहत नियमों के रूप में समझा जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति आर. कलैमथी ने कहा:

“पूरे सम्मान के साथ, हम इस विचार का समर्थन नहीं कर सकते कि एक न्यायिक निर्देश को अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 34 के तहत बनाए गए नियम के रूप में समझा जा सकता है।”

निर्दोषता की अवधारणा (Presumption of Innocence): कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जब क़ानून ‘दोषसिद्धि’ (Conviction) को बाधा मानता है, तो रिट कोर्ट इसका विस्तार करके इसमें ‘आरोप’ या ‘लंबित मामले’ (Implication) को शामिल नहीं कर सकता।

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“जब वैधानिक प्रावधान दोषसिद्धि को एक बाधा के रूप में बात करता है, तो रिट कोर्ट के लिए यह मानना उचित नहीं होगा कि आपराधिक मामले में केवल नामजद होना भी पंजीकरण के लिए बाधा बन जाएगा। हम इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं कर सकते कि निर्दोष होने की अवधारणा (Presumption of innocence) एक मानवाधिकार है।”

निर्णय

खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानून के मद्देनजर, एस.एम. अनंत मुरुगन मामले में दिए गए निर्देशों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

हालांकि, चूंकि एक समान खंडपीठ और एक पूर्ण पीठ ने पहले उन निर्देशों की पुष्टि की थी, इसलिए वर्तमान पीठ ने कोई विपरीत आदेश जारी नहीं किया। कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए बड़ी पीठ (Larger Bench) के गठन पर विचार करने हेतु कागजात माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखे जाएं।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: एस. भास्करपांडियन बनाम चेयरमैन / सेक्रेटरी, बार काउंसिल ऑफ तमिलनाडु
  • केस नंबर: W.P(MD) No.6986 of 2015
  • कोरम: न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति आर. कलैमथी

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