केरल हाईकोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी को जमानत देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी और पीड़िता की मां के बीच वित्तीय विवाद के कारण “झूठे फंसाने की स्पष्ट संभावना” (discernible possibility of false implication) हो, तो एफआईआर दर्ज करने में हुई तीन साल की देरी की बारीकी से जांच की जानी चाहिए।
जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन की पीठ ने याचिकाकर्ता श्रीनाथ के.एस. की जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि यौन अपराध के मामलों में देरी आम तौर पर अभियोजन पक्ष के लिए घातक नहीं होती है, लेकिन जब विशिष्ट परिस्थितियां झूठे आरोप लगाने के मकसद की ओर इशारा करती हैं, तो इस देरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता श्रीनाथ के.एस. को पलक्कड़ जिले के शोरनूर पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 804/2025 में एकमात्र आरोपी बनाया गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(3), 354A(1)(i), 449 और पॉक्सो एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध किया है।
अभियोजन के अनुसार, आरोपी पीड़िता की मां का दोस्त था। घटना के समय पीड़िता की उम्र 13 वर्ष थी, जो अब 16 वर्ष है। आरोप है कि 1 जनवरी, 2022 से 31 दिसंबर, 2022 के बीच आरोपी ने उस किराए के मकान के बेडरूम में प्रवेश किया जहां पीड़िता रहती थी और उसका यौन उत्पीड़न किया। आरोपी को 29 अक्टूबर, 2025 को गिरफ्तार किया गया था।
कोर्ट के समक्ष दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि आरोपी “पूरी तरह से निर्दोष” है और यह मामला “झूठे फंसाने का स्पष्ट उदाहरण” है। बचाव पक्ष का कहना था कि पीड़िता की मां ने याचिकाकर्ता से भारी रकम उधार ली थी और उसे चुकाने से बचने के लिए यह झूठी शिकायत दर्ज कराई। अपने दावे को साबित करने के लिए, याचिकाकर्ता ने 20,00,000 रुपये का एक चेक भी पेश किया, जो कथित तौर पर पीड़िता की मां ने याचिकाकर्ता के पक्ष में जारी किया था।
इसके अलावा, बचाव पक्ष ने बताया कि पीड़िता की मां, जो अपने पति से अलग रह रही थी, याचिकाकर्ता से शादी करना चाहती थी। लेकिन याचिकाकर्ता ने 20 अक्टूबर, 2025 को किसी अन्य महिला से शादी कर ली। वकील ने तर्क दिया कि इस शादी ने “पीड़िता की मां के मन में द्वेष पैदा कर दिया,” जिसके परिणामस्वरूप यह झूठा मामला दर्ज कराया गया।
वहीं, लोक अभियोजक और पीड़िता के वकील ने अपराध की “गंभीर प्रकृति” का हवाला देते हुए जमानत का विरोध किया और पीड़िता की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी का विश्लेषण करते हुए कहा कि अपराध कथित घटना के लगभग तीन साल बाद दर्ज किया गया था। कोर्ट ने कहा:
“हालांकि मैं इस स्थापित कानून से अवगत हूं कि यौन अपराध के मामलों में एफआईआर दर्ज करने में देरी अक्सर बहुत कम मायने रखती है क्योंकि सामाजिक कलंक और पीड़िता का भविष्य माता-पिता के दिमाग पर भारी पड़ता है, लेकिन यह सिद्धांत पूर्ण (absolute) नहीं है। जहां झूठे फंसाने की स्पष्ट संभावना हो, वहां ऐसी देरी की बारीकी से जांच की जानी चाहिए।”
कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजी सबूतों, जिसमें चेक और पीड़िता की मां का “सूर्या कंस्ट्रक्शंस” के प्रोपराइटर के रूप में ट्रेड लाइसेंस शामिल था, पर विचार किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ये दस्तावेज “प्रथम दृष्टया पक्षों के बीच वित्तीय लेनदेन के अस्तित्व का सुझाव देते हैं।”
मेडिकल सबूतों के संबंध में, कोर्ट ने कहा:
“यह भी ध्यान देने योग्य है कि पीड़िता की मेडिकल जांच से पता चलता है कि उसका हाइमन (hymen) सुरक्षित है। यद्यपि यह मेडिकल साक्ष्य आईपीसी की धारा 375 के तहत परिभाषित यौन हमले की संभावना को पूरी तरह से खारिज नहीं करता है, लेकिन यह एक ऐसा कारक है जो इस स्तर पर आरोपी के निर्दोष होने के बचाव का समर्थन करता है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दस्तावेजों की वास्तविकता और वित्तीय लेनदेन का अस्तित्व केवल “पूर्ण सुनवाई (full-fledged trial) के बाद ही निर्णायक रूप से तय किया जा सकता है” और वह जमानत के स्तर पर “मिनी-ट्रायल” नहीं कर सकता। हालांकि, यह देखते हुए कि जांच पूरी हो चुकी है और अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी गई है, कोर्ट ने माना कि आरोपी को अब न्यायिक हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है।
फैसला
केरल हाईकोर्ट ने जमानत याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को कड़ी शर्तों पर रिहा करने का निर्देश दिया। लगाई गई शर्तें इस प्रकार हैं:
- याचिकाकर्ता को 1,00,000 रुपये का बांड और इतनी ही राशि के दो सक्षम जमानतदार पेश करने होंगे।
- याचिकाकर्ता मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं करेगा।
- याचिकाकर्ता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पीड़िता या उसके परिवार के सदस्यों से संपर्क नहीं करेगा।
- याचिकाकर्ता कोर्ट में पेश होने के अलावा, छह महीने तक त्रिशूर और पलक्कड़ राजस्व जिलों में प्रवेश नहीं करेगा।
- याचिकाकर्ता क्षेत्राधिकार वाली कोर्ट की अनुमति के बिना भारत नहीं छोड़ेगा।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: श्रीनाथ के.एस. बनाम केरल राज्य और अन्य
केस नंबर: बेल एप्लीकेशन नंबर 14542 ऑफ 2025
पीठ: जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन

