केरल हाईकोर्ट ने केरल विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार के. एस. अनिल कुमार के खिलाफ मेमो ऑफ चार्जेस पर लगाई रोक; कुलपति की आपातकालीन शक्तियों के प्रयोग पर सवाल

केरल हाईकोर्ट ने सोमवार को केरल विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार के. एस. अनिल कुमार के खिलाफ जारी मेमो ऑफ चार्जेस पर रोक लगाते हुए कुलपति द्वारा आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल उठाए।

एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस पी. वी. कुन्हिकृष्णन ने यह अंतरिम आदेश दिया। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मोहनन कुनुम्मल ने अनिल कुमार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करते हुए उनके खिलाफ चार्जशीट जारी की थी, जिसमें उन पर कदाचार के आरोप लगाए गए थे।

अनिल कुमार ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि रजिस्ट्रार की नियुक्ति और अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार केवल विश्वविद्यालय की सिंडिकेट समिति को है, न कि कुलपति को। उन्होंने यह भी कहा कि कुलपति द्वारा आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग करना कानूनी रूप से अनुचित था।

कोर्ट ने केरल विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 10(13) का हवाला दिया, जिसके अनुसार केवल आपात स्थिति में कुलपति को सिंडिकेट या अकादमिक परिषद की शक्तियों का अस्थायी उपयोग करने की अनुमति है, और वह भी इस शर्त पर कि वह अपने निर्णय को अगली सिंडिकेट बैठक में अनुमोदन के लिए रखे।

न्यायालय ने कहा,

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“मैं यह देखकर आश्चर्यचकित हूं कि यह चार्जशीट जारी की गई। इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसी कौन-सी आपात स्थिति उत्पन्न हुई जिसके कारण चार्जशीट जारी करना आवश्यक हो गया।”

कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि कुलपति द्वारा जारी यह चार्जशीट 24 दिसंबर 2025 को हुई सिंडिकेट की अगली बैठक में भी पेश नहीं की गई, जो कि नियम के अनुसार अनिवार्य था।

न्यायालय ने कहा,

“प्रथमदृष्टया मुझे लगता है कि कुलपति ने बिना वैधानिक अधिकार के यह चार्जशीट जारी की। कुलपति को यह स्पष्ट करना होगा कि किस आधार पर उन्होंने इस मामले को आपात स्थिति मानकर धारा 10(13) का उपयोग किया।”

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चार्जशीट के आधार पर आगे की सभी कार्यवाहियों पर स्थगन रहेगा, और कुलपति को निर्देश दिया कि वह जवाबी हलफनामा दाखिल करें। यदि उन्हें कोई अत्यावश्यकता हो तो वे मामले का उल्लेख करके तत्काल सुनवाई की मांग कर सकते हैं।

गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में अनिल कुमार ने राज्य सरकार को सूचित किया था कि वे रजिस्ट्रार के पद पर बने रहने के इच्छुक नहीं हैं, जिसके बाद उन्हें उनके मूल विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया था।

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यह मामला न केवल विश्वविद्यालय प्रशासनिक प्रक्रिया में कानूनी प्रक्रिया और शक्ति सीमा को लेकर महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उच्च शिक्षा संस्थानों में कार्यपालिका के अधिकारों की न्यायिक समीक्षा की अहम मिसाल भी बन सकता है।

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