केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ (NDPS) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में, पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को दिए जाने वाले ‘गिरफ्तारी के आधारों’ (Grounds of Arrest) में पकड़े गए प्रतिबंधित पदार्थ की मात्रा का स्पष्ट उल्लेख करना अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा न करना संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत अनिवार्य संवैधानिक आवश्यकताओं का उल्लंघन है, जिससे गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध हो जाती है।
जस्टिस कौसर एडप्पागथ की एकल पीठ ने अगस्त 2025 से हिरासत में चल रहे एक आरोपी को जमानत देते हुए यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि चूंकि NDPS अधिनियम के तहत अपराध जमानती होगा या गैर-जमानती, यह पूरी तरह से बरामद पदार्थ की मात्रा पर निर्भर करता है, इसलिए गिरफ्तारी के आधारों के “प्रभावी संचार” (Effective Communication) के लिए मात्रा का विवरण देना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला (शराफुद्दीन बनाम केरल राज्य) चलिसेरी पुलिस स्टेशन, पलक्कड़ के अपराध क्रमांक 587/2025 से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 16 अगस्त 2025 को याचिकाकर्ता (आरोपी नंबर 1) और दो अन्य व्यक्तियों के पास से 69.90 ग्राम MDMA बरामद किया गया था। उन पर NDPS अधिनियम की धारा 22(c) और 29 के तहत आरोप लगाए गए थे। याचिकाकर्ता घटना के दिन से ही न्यायिक हिरासत में था।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री अनीश के.आर. ने तर्क दिया कि यह गिरफ्तारी अवैध थी क्योंकि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित में उपलब्ध नहीं कराए गए थे। उन्होंने दलील दी कि यह अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 47 के तहत एक अनिवार्य प्रक्रिया है।
वहीं, वरिष्ठ लोक अभियोजक श्री एम.सी. अशी ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि गिरफ्तारी के समय BNSS के अध्याय V के तहत सभी कानूनी औपचारिकताओं का पालन किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी की संलिप्तता को देखते हुए वह जमानत का हकदार नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
कोर्ट ने केस डायरी का अवलोकन करने के बाद पाया कि हालांकि आरोपी को गिरफ्तारी के अलग-अलग आधार बताए गए थे, लेकिन उनमें केवल “नशीले पदार्थों के अवैध कब्जे” का जिक्र था। बरामद किए गए प्रतिबंधित पदार्थ की मात्रा का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।
जस्टिस एडप्पागथ ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का संदर्भ दिया:
- पंकज बंसल बनाम भारत संघ: जिसमें यह निर्धारित किया गया था कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में देना एक अनिवार्य नियम है।
- प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (NCT दिल्ली): जिसमें कहा गया कि गिरफ्तारी के कारणों को जानने का अधिकार मौलिक अधिकार है और इसका उल्लंघन गिरफ्तारी की प्रक्रिया को दूषित करता है।
- मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य: जिसमें तीन जजों की बेंच ने माना कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में, ऐसी भाषा में होने चाहिए जिसे आरोपी समझ सके, और मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से कम से कम दो घंटे पहले दिए जाने चाहिए।
NDPS मामलों के संदर्भ में, हाईकोर्ट ने अपने पिछले फैसलों (याज़िन एस. बनाम केरल राज्य और विष्णु एन.पी. बनाम केरल राज्य) का हवाला देते हुए कहा कि गिरफ्तारी की सूचना में न केवल दंडात्मक धाराओं का बल्कि बरामद मात्रा का भी उल्लेख होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कानूनी सिद्धांतों को संक्षेप में स्पष्ट किया:
“गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देने का संवैधानिक आदेश सभी कानूनों के तहत अनिवार्य है… NDPS मामलों में, गिरफ्तारी के आधारों के प्रभावी संचार के लिए जब्त किए गए प्रतिबंधित पदार्थ की मात्रा का विवरण देना अनिवार्य है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 22(1) के अनुपालन को साबित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से जांच एजेंसी पर है।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि गिरफ्तारी के आधारों में मात्रा का उल्लेख न होने का अर्थ है कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और BNSS की धारा 47 की आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा, “इसलिए, आवेदक की गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड कानूनी रूप से अस्तित्वहीन (Nonest) है और वह जमानत पर रिहा होने का हकदार है।”
याचिकाकर्ता को ₹1,00,000/- के बांड और दो जमानतदारों के साथ सशर्त जमानत दी गई। शर्तों के अनुसार, उसे हर शनिवार जांच अधिकारी के सामने पेश होना होगा और कोर्ट की अनुमति के बिना केरल राज्य से बाहर जाने पर रोक रहेगी।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: शराफुद्दीन बनाम केरल राज्य
- केस नंबर: बेल एप्लीकेशन नंबर 1772/2026
- तारीख: 1 अप्रैल, 2026
- पीठ: जस्टिस कौसर एडप्पागथ

