“भारतीय समाज दुनिया के सबसे नस्लभेदी समाजों में से एक है, इंसानों को इंसान नहीं समझते”: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने शुक्रवार को भारतीय समाज की मानसिकता पर गंभीर सवाल उठाते हुए एक अहम टिप्पणी की। एकल पीठ (Single Judge Bench) की सुनवाई के दौरान जस्टिस एम.आई. अरुण ने कहा कि भारतीय समाज “दुनिया के सबसे नस्लभेदी (racist) समाजों में से एक है।” यह टिप्पणी न्यूज़ एंकर सुधीर चौधरी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने की मांग की थी।

हाईकोर्ट सुधीर चौधरी और ‘आज तक’ चैनल द्वारा दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह मामला 2023 में प्रसारित ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ शो के एक एपिसोड से जुड़ा है, जिसमें कर्नाटक सरकार की ‘स्वावलंबी सारथी योजना’ पर चर्चा की गई थी।

कर्नाटक अल्पसंख्यक विकास निगम (Karnataka Minorities Development Corporation) की शिकायत पर शेषाद्रिपुरम पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप है कि न्यूज़ रिपोर्ट में गलत दावा किया गया कि यह सब्सिडी योजना केवल अल्पसंख्यकों के लिए है और हिंदुओं को जानबूझकर इससे वंचित रखा जा रहा है। अभियोजन पक्ष का कहना है कि इससे समुदायों के बीच वैमनस्य (enmity) फैल सकता है, जो आईपीसी की धारा 153A के तहत अपराध है।

कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां: समाज, राजनीति और नव-उपनिवेशवाद

सुनवाई के दौरान जस्टिस अरुण ने केवल कानूनी पहलुओं पर ही नहीं, बल्कि भारत में सांप्रदायिक तनाव की जड़ में मौजूद सामाजिक मानसिकता पर भी विस्तार से बात की।

1. “हम सबसे बड़े नस्लभेदी हैं”

अक्सर यह माना जाता है कि नस्लवाद पश्चिमी देशों की समस्या है, लेकिन कोर्ट ने इस धारणा को खारिज कर दिया। जस्टिस अरुण ने कहा कि हम भारतीय खुद को अलग-अलग समुदायों में बांटकर देखते हैं और एक-दूसरे के साथ अलग ‘प्रजातियों’ जैसा व्यवहार करते हैं।

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“भारतीय समाज की समस्या यह है—और इसमें सभी समुदाय शामिल हैं—कि हम यह नहीं समझते कि ‘होमो सेपियंस’ (Homo sapiens) नाम की केवल एक ही प्रजाति है। हम दुनिया के सबसे बड़े नस्लभेदी समाजों में से एक हैं। हम दूसरों पर नस्लवाद और रंगभेद का आरोप लगाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम भी किसी से कम नहीं हैं। हमारी मानसिकता ऐसी है कि हम हर समुदाय को एक अलग प्रजाति मानते हैं और उसी आधार पर भेदभाव करते हैं।”

2. कॉर्पोरेट गुलामी और “नव-उपनिवेशवाद” (Neo-Colonialism)

इतिहास का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि भारतीयों में ‘भारतीयता’ की भावना की कमी ने ही हमें गुलाम बनाया था और अब हम दोबारा उसी दिशा में बढ़ रहे हैं।

“ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ हजार ब्रिटिश सुरक्षाकर्मियों ने हमें गुलाम बना लिया क्योंकि उस समय हमारे अंदर ‘भारतीयता’ का कोई विचार नहीं था। जब यह भावना आई, तो हमने अंग्रेजों को बाहर खदेड़ दिया। लेकिन अब कंपनियों और कॉर्पोरेट सेक्टर के जरिए ‘नव-उपनिवेशवाद’ का दौर शुरू हो गया है। इसका कारण वही पुरानी आदत है—हम आज भी इंसान को इंसान के रूप में देखने से इनकार कर रहे हैं।”

3. राजनीति समाज का ही आईना है: “जैसे लोग, वैसे नेता”

जब चर्चा राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर मुड़ी, तो कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक दल केवल समाज की मांग को पूरा करते हैं। टिकट बंटवारे में जाति और समुदाय को प्राथमिकता इसलिए दी जाती है क्योंकि वोटर यही चाहता है।

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“जब चुनाव में टिकट दिया जाता है, तो उम्मीदवार की योग्यता से 50 प्रतिशत से ज्यादा महत्व उसके समुदाय को दिया जाता है… बताइए, कौन सी राजनीतिक पार्टी यह कहकर चुनाव लड़ती है कि ‘मैं अनुच्छेद 14, 19 (1)(a) और 21 में विश्वास करता हूं’? हम कहते हैं कि नेता भ्रष्ट हैं, लेकिन लोकतंत्र में जनता को वही नेता मिलते हैं जिसके वे हकदार होते हैं।”

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि समाज का विकास धार्मिक विचारधाराओं से नहीं, बल्कि “तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण” (rationality and scientific temperament) से होता है।

सुनवाई के दौरान एक अहम कानूनी सवाल यह उठा कि क्या शो का कंटेंट “झूठी खबर” (False News) था या “नीति का विश्लेषण” (Inflammatory Analysis)।

  • राज्य सरकार की दलील: सरकारी वकील ने तर्क दिया कि शो में एक विशेष समुदाय का दानवीकरण (demonised) किया गया और नफरत फैलाई गई, इसलिए धारा 153A के तहत जांच जरूरी है।
  • कोर्ट का सवाल: जस्टिस अरुण ने कहा कि राज्य को यह साबित करना होगा कि रिपोर्ट में कौन सा तथ्य स्पष्ट रूप से झूठा था।
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“अगर न्यूज़ रिपोर्ट में झूठ बोला गया है, तो याचिका खारिज कर दी जाएगी। लेकिन अगर यह नीति का विश्लेषण है… और यह कहा गया है कि नीति किसी एक वर्ग का तुष्टिकरण करती है… तो यह भड़काऊ हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सच है या झूठ? अगर यह झूठ है, तो कोर्ट को बताएं कि झूठ क्या है।”

निष्कर्ष और अगली सुनवाई

हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि प्रतिवादी इसे भड़काऊ बता रहे हैं, लेकिन अभी तक वे यह साबित नहीं कर पाए हैं कि चैनल द्वारा दिए गए बयानों में तथ्यात्मक झूठ क्या है।

कोर्ट ने सुधीर चौधरी और चैनल के खिलाफ किसी भी दंडात्मक कार्रवाई (coercive action) पर लगी रोक को जारी रखा है। मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी 2026 को होगी।

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