कर्नाटक हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता के आरोपों का सामना कर रही एक महिला के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पति के पड़ोसी को धारा 498A के तहत ‘रिश्तेदार’ नहीं माना जा सकता है, इसलिए उन पर इस धारा के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने आशा जी नामक याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि परिवार के बाहर के किसी अजनबी व्यक्ति (stranger) के खिलाफ इस तरह की कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 13 फरवरी 2021 को दर्ज कराई गई एक शिकायत से उत्पन्न हुआ था। शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) का विवाह 17 नवंबर 2006 को आरोपी नंबर 1 के साथ हुआ था। शिकायत के अनुसार, शादी के कुछ समय बाद ही वैवाहिक जीवन में विवाद शुरू हो गए, जिसके चलते दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप लगाए गए।
पुलिस ने मामले की जांच के बाद पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498A, 504, 506, और 323 (धारा 34 के साथ पठित) और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4 के तहत आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया।
इस चार्जशीट में याचिकाकर्ता आशा जी को आरोपी नंबर 5 बनाया गया था। उन पर आरोप था कि वह पति के घर के बगल में रहने वाली पड़ोसी हैं और पति के साथ उनका संबंध था। शिकायत में कहा गया कि पति ने धमकी दी थी कि यदि पत्नी अधिक दहेज नहीं लाई, तो वह याचिकाकर्ता से शादी कर लेगा। इसके अलावा, यह भी आरोप लगाया गया कि 11 दिसंबर 2020 को याचिकाकर्ता ने पति और उसके रिश्तेदारों के साथ मिलकर शिकायतकर्ता को गालियां दीं और जान से मारने की धमकी दी।
वकीलों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए विद्वान अधिवक्ता श्री चंदन के. ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता केवल एक पड़ोसी है और उसका अन्य आरोपियों के पारिवारिक मामलों में कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ एकमात्र आरोप यह है कि उसने पति को “विशेष तरीके से व्यवहार करने के लिए उकसाया।” उन्होंने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने रंजिश के कारण उन्हें आरोपी बनाया है।
इसके विपरीत, प्रतिवादी-शिकायतकर्ता के वकील ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ही पति के व्यवहार का मुख्य कारण है और चूंकि उसने पति और उसके परिवार के साथ मिलकर पत्नी को प्रताड़ित किया है, इसलिए उसे भी मुकदमे का सामना करना चाहिए।
हाईकोर्ट के सरकारी वकील (HCGP) श्री के. नागेश्वरप्पा ने भी शिकायतकर्ता की दलीलों का समर्थन किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी
जस्टिस नागप्रसन्ना ने चार्जशीट और शिकायत का अवलोकन किया और पाया कि याचिकाकर्ता को पति के घर के बगल में रहने वाली पड़ोसी बताया गया है। अदालत ने पाया कि ‘उकसाने’ के आरोप के अलावा, याचिकाकर्ता आईपीसी की धारा 498A के तहत आवश्यक “परिवार” की परिभाषा में फिट नहीं बैठती है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले रमेश कन्नौजिया और अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य और अन्य (2024) का हवाला दिया। उस मामले में, शीर्ष अदालत ने कहा था कि पति के परिवार के पड़ोसी पति के “रिश्तेदार” नहीं होते हैं और उन्हें आईपीसी की धारा 498A के अपराधों के लिए फंसाया नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को उद्धृत करते हुए, कर्नाटक हाईकोर्ट ने नोट किया:
“आईपीसी की धारा 498-ए में ‘रिश्तेदार’ शब्द का संदर्भ केवल खून के रिश्तों या विवाह से जुड़े रिश्तों तक ही सीमित होगा।”
इस सिद्धांत को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए, जस्टिस नागप्रसन्ना ने टिप्पणी की:
“इस याचिकाकर्ता का नाम कहीं भी नहीं पाया गया है, सिवाय यह आरोप लगाने के कि उसने पति को पत्नी को प्रताड़ित करने के लिए उकसाया। अन्यथा याचिकाकर्ता धारा 498A के प्रावधान के तहत परिवार की परिभाषा में फिट नहीं बैठती।”
अदालत ने आगे कहा:
“इस आलोक में, पति, पत्नी या परिवार के सदस्यों के बीच धारा 498A के तहत अपराधों के लिए किसी अजनबी (stranger) को कार्यवाही में नहीं घसीटा जा सकता। इस याचिकाकर्ता के खिलाफ आगे की कार्यवाही की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे न्याय की हानि होगी।”
फैसला
परिणामस्वरूप, कर्नाटक हाईकोर्ट ने आपराधिक याचिका को स्वीकार कर लिया और मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, बेंगलुरु की फाइल पर चल रहे C.C.No.32092/2021 की कार्यवाही को केवल याचिकाकर्ता आशा जी के हद तक रद्द कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश में की गई टिप्पणियां केवल सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिकाकर्ता के मामले पर विचार करने के लिए थीं और इनका प्रभाव अन्य आरोपियों के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर नहीं पड़ेगा।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: आशा जी बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल पिटीशन नंबर 1504 ऑफ 2023
- कोरम: जस्टिस एम. नागप्रसन्ना
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री चंदन के.
- प्रतिवादी के वकील: श्री के. नागेश्वरप्पा (HCGP)

