झारखंड हाईकोर्ट ने देश में बिना वैध दस्तावेजों के रह रहे तीन बांग्लादेशी नागरिकों को जल्द से जल्द उनके देश वापस भेजने (डिपोर्ट करने) का निर्देश केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को दिया है। अदालत ने विदेश मंत्रालय, झारखंड सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार को इस मामले में फौरी कदम उठाने और 25 नवंबर तक अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का स्पष्ट आदेश दिया है।
यह निर्देश जस्टिस संजय प्रसाद की एकल पीठ ने मोहम्मद नजमुल हवलदार की अपील पर सुनवाई के दौरान दिया। निचली अदालत ने 19 जून 2024 को हवलदार को विदेशी नागरिक अधिनियम (फॉरेनर्स एक्ट) के तहत दोषी ठहराते हुए दो साल के कारावास की सजा सुनाई थी। हवलदार ने इसी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। मामले में हाईकोर्ट ने 17 जून को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे 29 सितंबर को सुनाया गया और मंगलवार को आदेश की विस्तृत प्रति उपलब्ध कराई गई।
करदाताओं के पैसे पर नहीं बने रह सकते बोझ: हाईकोर्ट
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि बिना वैध दस्तावेजों वाले विदेशी नागरिकों के निर्वासन को लेकर सरकारों को अधिक सक्रिय रुख अपनाना चाहिए। पीठ ने कहा कि हवलदार जैसे लोग इस देश के करदाताओं और गरीब जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे पर भोजन और आश्रय हासिल कर रहे हैं। अदालत ने रेखांकित किया कि यदि ऐसे लोगों को मुकदमे की सुनवाई पूरी होने तक जेलों में ही बंद रखा जाता है, तो वे न केवल राज्य बल्कि पूरे समाज और देश पर निरंतर आर्थिक व सामाजिक बोझ बने रहेंगे।
सिलहट सीमा से 20 हजार रुपये देकर की थी घुसपैठ
अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, हवलदार ने पूछताछ में कबूल किया था कि उसने जनवरी 2023 में मोहम्मद सागर नाम के एक बिचौलिए को 20,000 रुपये देकर सिलहट सीमा के रास्ते भारत में अवैध रूप से प्रवेश किया था। घुसपैठ के बाद वह दिल्ली पहुंचा और वहां कबाड़ बीनने का काम करने लगा। कुछ समय बाद वह झारखंड के साहिबगंज जिले के राजमहल इलाके में आ गया, जहां स्थानीय पुलिस ने 24 फरवरी 2023 को उसे गिरफ्तार कर लिया।
हिरासत केंद्र से भागने का प्रयास और बांग्लादेशी उच्चायोग का रवैया
शुरुआती कानूनी कार्रवाई के बाद हवलदार को हजारीबाग स्थित विदेशी नागरिक हिरासत केंद्र (डिटेंशन सेंटर) भेज दिया गया। वहां उसकी पहचान दो बांग्लादेशी महिलाओं से हुई, जो खुद भी बिना वैध दस्तावेजों के भारत में अवैध रूप से रह रही थीं। 9 जून 2025 को इन तीनों ने हिरासत केंद्र से भागने की कोशिश की, लेकिन मुस्तैद पुलिस बल ने उन्हें तुरंत दबोच लिया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि हवलदार के निर्वासन को लेकर झारखंड सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और विदेश मंत्रालय के बीच कई दौर का पत्राचार हुआ। साथ ही, अदालत ने इस प्रक्रिया में बांग्लादेश उच्चायोग द्वारा तथ्यों को जानबूझकर छिपाने का भी संज्ञान लिया। पीठ ने दर्ज किया कि जब भारतीय अधिकारियों ने बांग्लादेश के उच्चायोग से संपर्क साधा, तो उसने हवलदार को अपने देश का नागरिक मानने से ही साफ इनकार कर दिया था।

