भर्ती प्रक्रिया में नियम या विज्ञापन में उल्लेख न होने पर भी अभ्यर्थियों की शॉर्टलिस्टिंग की जा सकती है: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

जिला अदालतों में कर्मचारियों की भर्ती को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पदों की तुलना में अत्यधिक संख्या में आवेदन आने पर चयन प्राधिकारी अभ्यर्थियों को शॉर्टलिस्ट करने की प्रक्रिया अपना सकते हैं, भले ही सेवा नियमों या भर्ती विज्ञापन में इसका अलग से कोई उल्लेख न हो। जस्टिस बिभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने माना कि केवल न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता पूरी कर लेने से किसी अभ्यर्थी को चयन प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में शामिल किए जाने का कोई अटूट या पूर्ण अधिकार नहीं मिल जाता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने रायपुर, राजनांदगांव, मुंगेली और सरगुजा जिला न्यायालयों में ग्रेजुएशन के अंकों के आधार पर तय किए गए स्क्रीनिंग कट-ऑफ को चुनौती देने वाली दोनों रिट याचिकाएं खारिज कर दीं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जिला न्यायपालिका में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर सीधी भर्ती से जुड़ी दो याचिकाओं से संबंधित था, जिनमें लिखित परीक्षा से पहले ग्रेजुएशन के अंकों का न्यूनतम प्रतिशत तय कर अभ्यर्थियों की छंटनी करने को चुनौती दी गई थी।

पहली याचिका में याचिकाकर्ता अनिल कुमार ने रायपुर जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा स्टेनोग्राफर ग्रेड-3 के पदों के लिए जारी विज्ञापन और राजनांदगांव जिला न्यायालय द्वारा स्टेनोग्राफर ग्रेड-3 (हिंदी) व सहायक ग्रेड-3 के पदों के लिए जारी विज्ञापन में लागू ग्रेजुएशन-प्रतिशत स्क्रीनिंग कट-ऑफ को चुनौती दी थी।

दूसरी याचिका में याचिकाकर्ता सुधीर टोप्पो ने मुंगेली जिला न्यायालय में सहायक ग्रेड-3 तथा सरगुजा जिला न्यायालय में सहायक ग्रेड-3 और भृत्य (चपरासी) के पदों के लिए निर्धारित शॉर्टलिस्टिंग व्यवस्था पर सवाल उठाया था।

दोनों याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि छत्तीसगढ़ जिला न्यायपालिका स्थापना (भर्ती एवं सेवा शर्तें) कर्मचारी नियम, 2023 में इस प्रकार के अतिरिक्त स्क्रीनिंग कट-ऑफ का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

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पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि अभ्यर्थी निर्धारित शैक्षणिक योग्यता रखते हैं और उन्होंने विज्ञापनों के अनुसार वैध आवेदन जमा किए हैं। ऐसे में न्यूनतम योग्यता के अतिरिक्त ग्रेजुएशन में निश्चित प्रतिशत की नई शर्त जोड़ना पात्र अभ्यर्थियों के परीक्षा में शामिल होने के अवसर को अनुचित रूप से सीमित करता है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जब कोई अभ्यर्थी मूल अर्हता पूरी करता है, तो उसे सीधे लिखित परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जानी चाहिए और मेरिट का निर्धारण परीक्षा के प्रदर्शन के आधार पर ही होना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चयन प्रक्रिया एक समान होनी चाहिए और बिलासपुर, कांकेर तथा कोरबा में अपनाई गई भर्ती प्रक्रियाओं का उदाहरण दिया।

इसके विपरीत, प्रतिवादी जिला न्यायपालिका प्राधिकरणों की ओर से पेश अधिवक्ता ने याचिकाओं का विरोध किया। उन्होंने कहा कि पूरी भर्ती प्रक्रिया वैधानिक नियमों और तय शर्तों के अनुरूप चलाई जा रही है। केवल न्यूनतम योग्यता होने से किसी अभ्यर्थी को यह निरपेक्ष अधिकार नहीं मिल जाता कि उसे किसी भी वैध शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे लिखित परीक्षा में बुलाया जाए।

प्रतिवादियों ने प्रशासनिक आवश्यकताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि विज्ञापित रिक्तियों की तुलना में आवेदनों की संख्या अत्यधिक थी। चयन प्रक्रिया को सुचारू, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए एक निष्पक्ष और व्यावहारिक स्क्रीनिंग पैमाना अपनाना आवश्यक था। उन्होंने सेवा नियमों के नियम 6, 8 और नियम 16(3) के साथ-साथ हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी अनुमति का हवाला देते हुए भेदभाव या मनमानेपन के आरोपों को खारिज किया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें

जस्टिस गुरु ने विचारणीय प्रश्न तय करते हुए यह परखा कि क्या न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता के अतिरिक्त स्क्रीनिंग पैमाना लागू करना नियमों के विरुद्ध या मनमाना माना जा सकता है।

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आवेदन की न्यूनतम योग्यता और शॉर्टलिस्टिंग के अधिकार के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“न्यूनतम पात्रता योग्यता पूरी करने से अभ्यर्थी सामान्यतः लागू भर्ती शर्तों के तहत विचार किए जाने का पात्र बनता है। यह अपने आप में, आवेदकों की संख्या, रिक्तियों की संख्या और शॉर्टलिस्टिंग की वैध पद्धति की परवाह किए बिना, चयन प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में बुलाए जाने का कोई अटूट अधिकार प्रदान नहीं करता है। जहां रिक्तियों की तुलना में आवेदकों की संख्या अत्यधिक हो, वहां चयन प्राधिकारी अभ्यर्थियों को शॉर्टलिस्ट करने के लिए एक निष्पक्ष और तर्कसंगत मानदंड अपना सकता है। ऐसा मानदंड चयन प्रक्रिया की आवश्यकताओं से तार्किक संबंध रखता हो, मनमाना या भेदभावपूर्ण न हो और समान स्थिति वाले अभ्यर्थियों पर समान रूप से लागू किया गया हो।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले बी. रामकीचेनिन उर्फ बालागांधी बनाम भारत संघ (2008) पर भरोसा जताया, जिसमें एमपी पब्लिक सर्विस कमीशन बनाम नवनीत कुमार पोतदार और आंध्र प्रदेश सरकार बनाम पी. दिलीप कुमार के फैसलों का हवाला दिया गया था। अदालत ने रेखांकित किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अत्यधिक आवेदन आने की स्थिति में शॉर्टलिस्टिंग को एक व्यावहारिक माध्यम माना है:

“भले ही शॉर्टलिस्टिंग के लिए कोई नियम न हो और न ही पद के लिए आवेदन आमंत्रित करने वाले विज्ञापन में इसका कोई उल्लेख हो, फिर भी यदि आवेदन करने वाले योग्य उम्मीदवारों की संख्या बहुत अधिक है और प्राधिकारी के लिए उन सभी का साक्षात्कार लेना संभव नहीं है, तो चयन निकाय शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया का सहारा ले सकता है।”

अदालत ने दोहराया कि शॉर्टलिस्टिंग के लिए दो शर्तें आवश्यक हैं: पहला, इसका आधार तर्कसंगत और निष्पक्ष होना चाहिए; और दूसरा, यदि नियमों या विज्ञापन में शॉर्टलिस्टिंग की कोई विशेष विधि पहले से तय है, तो केवल उसी का पालन किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं द्वारा अन्य जिलों (बिलासपुर, कांकेर, कोरबा) का उदाहरण दिए जाने और सीधे लिखित परीक्षा कराने की मांग को खारिज करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“अदालत सक्षम प्राधिकारी द्वारा कानूनी रूप से अपनाई गई चयन पद्धति के स्थान पर किसी अन्य पसंदीदा पद्धति को केवल इसलिए प्रतिस्थापित नहीं कर सकती क्योंकि वह किसी विशेष अभ्यर्थी के लिए अधिक अनुकूल हो सकती है।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि चयन प्राधिकारी की शॉर्टलिस्टिंग की शक्ति असीमित नहीं है और वह नियमों की अनदेखी नहीं कर सकता, लेकिन जब तक कोई मनमानापन या भेदभाव साबित न हो, तब तक इस प्रशासनिक शक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता नियमों के उल्लंघन या किसी प्रकार के भेदभाव को साबित करने में विफल रहे हैं। स्क्रीनिंग का पैमाना सभी पर समान रूप से लागू किया गया था और इसे किसी अभ्यर्थी विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं गढ़ा गया था।

अतः अदालत ने विज्ञापनों और शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए दोनों रिट याचिकाएं और संबंधित आवेदन खारिज कर दिए।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: अनिल कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य 

वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 7303/2026 और डब्ल्यूपीएस संख्या 7304/2026 

पीठ: जस्टिस बिभु दत्त गुरु 

निर्णय की तिथि: 12/10/2026

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