झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार (Adultery) का झूठा और आधारहीन आरोप लगाता है, तो यह पत्नी के प्रति ‘क्रूरता’ मानी जाएगी। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने इस आधार पर पति की तलाक की अपील को खारिज कर दिया और फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, यह देखते हुए कि पति व्यभिचार और परित्याग (Desertion) के आरोपों को साबित करने में विफल रहा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील (F.A. No. 190 of 2023) पति द्वारा सरायकेला खरसावां के प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट के 23 जून 2023 के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी। फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1), (i) और (i-a) के तहत दायर तलाक की याचिका को खारिज कर दिया था।
याचिका के अनुसार, दोनों पक्षों का विवाह 9 मई 2012 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। शादी के बाद वे आदित्यपुर के दिंदली बस्ती में एक किराए के मकान में छह महीने तक साथ रहे और 8 जून 2016 को उनके एक पुत्र का जन्म हुआ।
अपीलकर्ता-पति का आरोप था कि शादी के छह महीने बाद ही पत्नी उसे छोड़कर अपने माता-पिता के पास चली गई। उसने दावा किया कि बच्चे के जन्म के बाद, जून 2020 में उसने अपनी पत्नी को उसके मायके में एक ग्रामीण (मिंटू महतो) के साथ “आपत्तिजनक स्थिति” में देखा। उसने आरोप लगाया कि जब उसने इसका विरोध किया और पत्नी के परिवार वालों को बुलाया, तो उसे धमकाया गया और उसके साथ मारपीट की गई। पति ने दलील दी कि पत्नी “बेवफा” है और उसका किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध है, जो मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है। उसने यह भी दावा किया कि पत्नी ने उसे दो साल से छोड़ रखा है।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (पति) के वकील ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने पत्नी के अवैध संबंधों के संबंध में प्रस्तुत स्पष्ट सबूतों पर उचित विचार नहीं किया। उन्होंने दलील दी कि पत्नी के विवाहेतर संबंधों ने पति को मानसिक पीड़ा दी है और उसका अलग रहना स्थापित हो चुका है। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि निचली अदालत का फैसला विकृत (perverse) है।
इसके विपरीत, प्रतिवादी (पत्नी) के वकील ने कहा कि पति व्यभिचार या क्रूरता के आरोपों को साबित करने में विफल रहा है। पत्नी ने आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि शादी में उसके पिता द्वारा जेवर और नकद दिए जाने के बावजूद उसे दहेज, विशेषकर मोटरसाइकिल की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। उसने कहा कि मिंटू महतो के साथ संबंध के आरोप पूरी तरह से “काल्पनिक” और “बेबुनियाद” हैं। उसने कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया कि पति अपनी जिरह (cross-examination) के दौरान कथित घटना की कोई तारीख या दिन नहीं बता सका। पत्नी ने कहा कि उसे 15 अप्रैल 2021 को ससुराल से निकाल दिया गया था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने सबूतों और “क्रूरता” व “परित्याग” की कानूनी परिभाषा की बारीकी से जांच की।
व्यभिचार के आरोप पर: कोर्ट ने पाया कि पति (गवाह P.W.4) जून 2020 की कथित घटना का कोई निश्चित दिन या तारीख बताने में विफल रहा। अन्य गवाहों (P.W.1 और P.W.2) के बयान भी सुनी-सुनाई बातों (hearsay) पर आधारित थे। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आसपास का कोई भी स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया।
खंडपीठ ने कहा:
“यह कोर्ट इस तथ्य से अवगत है कि वैवाहिक मुकदमों जैसे दीवानी मामलों में तथ्यों का प्रमाण ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (preponderance of probability) पर आधारित होता है, लेकिन चूंकि यहां जीवनसाथी के चरित्र पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, इसलिए ऐसे गंभीर मुद्दे को केवल संभावनाओं के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट फैमिली कोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत हुआ कि व्यभिचार के आरोप का कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है।
क्रूरता पर: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों, जिनमें वी. भगत बनाम डी. भगत (1994) और विजय कुमार रामचंद्र भाटे बनाम नीला विजय कुमार भाटे (2003) शामिल हैं, का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी पर चरित्रहीनता के निराधार आरोप लगाना क्रूरता है।
खंडपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पति द्वारा पत्नी पर व्यभिचार के बिना सबूत के आरोप लगाना ही पत्नी के प्रति क्रूरता है। कोर्ट ने कहा:
“जिस क्षण अपीलकर्ता-पति ने प्रतिवादी-पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया, वही अपने आप में पति द्वारा पत्नी के साथ की गई क्रूरता है। ऐसी स्थिति में यह कैसे कहा जा सकता है कि पत्नी ने अपनी मर्जी से पति का साथ छोड़ा है।”
परित्याग (Desertion) पर: साथ छोड़ने के दावे पर कोर्ट ने विश्लेषण किया कि क्या पत्नी के पास अलग रहने का “उचित कारण” था। कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने एक निश्चित तारीख, 15 अप्रैल 2021, बताई है जब उसे दहेज की मांग के कारण घर से निकाल दिया गया था।
खंडपीठ ने कहा:
“लिखित बयान में प्रतिवादी ने स्वीकार किया है कि 15.04.2021 को उसे अंततः ससुराल से निकाल दिया गया और तब से वह अपने मायके में रह रही है। यह तथ्य याचिकाकर्ता के इस दावे को खारिज करता है कि उसकी पत्नी अपनी मर्जी से उससे अलग रह रही है, बल्कि तथ्यात्मक पहलू से यह प्रतीत होता है कि उसे दहेज की निरंतर मांग और उत्पीड़न के कारण ससुराल छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था।”
फैसला
झारखंड हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई खामी नहीं है। पति व्यभिचार, क्रूरता या परित्याग के आधारों को साबित करने में विफल रहा। नतीजतन, अपील खारिज कर दी गई और तलाक देने से इनकार करने वाले फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा गया।

