झारखंड हाईकोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और दुष्कर्म के प्रयास के एक मामले में निचली अदालत द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले की पुष्टि की है। जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने पीड़िता द्वारा दायर दोषमुक्ति अपील (Acquittal Appeal) को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में विफल रहा है। हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए “झूठे फंसाने की संभावना” का भी उल्लेख किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जामताड़ा (महिला) थाना में 8 अगस्त 2020 को दर्ज की गई एक प्राथमिकी (FIR) पर आधारित है। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि 6 मई 2017 को मोहम्मद तालिब अंसारी (प्रतिवादी संख्या 4) के साथ निकाह के बाद से ही उसके पति, ससुर (रजाउद्दीन अंसारी) और नंदोई (सुल्तान अंसारी) 1,00,000 रुपये के अतिरिक्त दहेज की मांग कर रहे थे।
आरोप के अनुसार, दहेज की मांग पूरी न होने पर उसे प्रताड़ित किया गया। इसके अतिरिक्त, पीड़िता ने अपने ससुर और नंदोई पर छेड़छाड़ और 10 जुलाई 2020 को मायके में दुष्कर्म के प्रयास का भी आरोप लगाया था। पुलिस जांच के बाद, IPC की धारा 498A/34, 376/511 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मामला चला। 20 जनवरी 2025 को जामताड़ा के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था, जिसे इस अपील के माध्यम से चुनौती दी गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता (पीड़िता) के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने मुख्य गवाहों—पीड़िता (PW-2), उसकी मां (PW-1), मामा (PW-5) और पिता (PW-10)—के बयानों को मात्र इस आधार पर खारिज कर दिया कि वे रिश्तेदार थे। उन्होंने यह भी कहा कि जांच अधिकारियों ने पुष्टि की थी कि मामले को सुलझाने के लिए बुलाई गई ‘पंचायती’ में आरोपी शामिल नहीं हुए थे।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों और राज्य के वकील (A.P.P.) ने तर्क दिया कि कथित घटना के 28 दिनों बाद बिना किसी उचित स्पष्टीकरण के FIR दर्ज कराई गई थी। उन्होंने दलील दी कि आरोप “सामान्य और अस्पष्ट” थे और यह मामला केवल प्रतिवादियों पर दबाव बनाने और उन्हें अपमानित करने के लिए शुरू किया गया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पीड़िता (PW-2) के बयानों का सूक्ष्मता से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि दुष्कर्म के प्रयास का दावा करने के बावजूद, जिरह के दौरान पीड़िता ने स्वीकार किया कि “इस घटना से पहले उसने दहेज की मांग या प्रताड़ना के संबंध में किसी भी अधिकारी के पास कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी।”
खंडपीठ ने मामले में निम्नलिखित महत्वपूर्ण कमियां पाईं:
- लंबे समय से पृथक निवास: पीड़िता कथित घटना से लगभग दो साल पहले से ही अपने मायके में रह रही थी।
- स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति: पीड़िता ने दावा किया कि उसने घटना के समय शोर मचाया था, लेकिन उसने यह भी स्वीकार किया कि “उसके माता-पिता के अलावा गांव का कोई भी व्यक्ति वहां नहीं पहुंचा।”
- सुनी-सुनाई बातें (Hearsay): पीड़िता के पिता, मां और मामा ने घटना को स्वयं नहीं देखा था; उनके बयान केवल पीड़िता द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित थे।
- पक्षद्रोही गवाह: अभियोजन पक्ष के चार गवाह (PW-7, 8, 9, 11) अपने बयानों से मुकर गए।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया:
“गवाहों के साक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि पीड़िता और उसके पति के बीच संबंध तनावपूर्ण थे… FIR में वर्णित घटना और उस समय आरोपी सुल्तान अंसारी की उपस्थिति को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित नहीं किया गया है।”
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस विचार का समर्थन किया कि “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में झूठे फंसाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।”
अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपील में कोई कानूनी आधार नहीं है और निचली अदालत के विवेकपूर्ण फैसले में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने कहा, “हम ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों से सहमत हैं क्योंकि एक अलग दृष्टिकोण अपनाने का कोई वैध कारण नहीं है।” इसी के साथ, हाईकोर्ट ने इस अपील को सुनवाई के प्रारंभिक चरण (Admission stage) पर ही खारिज कर दिया।
केस विवरण
- केस शीर्षक: पीड़िता बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य
- केस संख्या: Acquittal Appeal (DB) No. 45 of 2025
- पीठ: जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव
- दिनांक: 25 फरवरी, 2026

