रांची: स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत विवाह विच्छेद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर पत्नी द्वारा लगाए गए वैवाहिक क्रूरता के आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसने कोई औपचारिक एफआईआर (प्राथमिकी) दर्ज नहीं कराई थी। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट, जमशेदपुर के आदेश को निरस्त करते हुए क्रूरता और परित्याग के आधार पर विवाह विच्छेद की डिक्री मंजूर कर ली। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी पत्नी को पति के दुर्व्यवहार और क्रूरता के कारण मजबूर होकर अपनी ससुराल छोड़नी पड़ती है, तो कानून की नजर में इसे पत्नी द्वारा किया गया स्वैच्छिक परित्याग या ‘डेजर्शन’ नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों का विवाह 20 अक्टूबर 2010 को सब-रजिस्ट्री कार्यालय, जमशेदपुर में विवाह अधिकारी के समक्ष स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पंजीकृत हुआ था और हिंदू रीति-रिवाजों से भी संपन्न हुआ था। विवाह के बाद अपीलकर्ता पत्नी ससुराल में रहने लगी। इस वैवाहिक संबंध से जनवरी 2012 में एक पुत्री और अक्टूबर 2015 में एक पुत्र का जन्म हुआ।
अपीलकर्ता के अनुसार, पुत्र के जन्म और 2015 में ससुर के निधन के बाद प्रतिवादी पति शराब का आदी हो गया, उसने कामकाज छोड़ दिया और पत्नी के साथ गाली-गलौज, मारपीट व घरेलू हिंसा करने लगा। अपीलकर्ता ने सुधार की उम्मीद में लंबे समय तक यह सब सहन किया। आरोप है कि 15 मार्च 2018 को प्रतिवादी ने पत्नी और दोनों नाबालिग बच्चों को ससुराल से निकाल दिया।
इसके बाद अपीलकर्ता ने अपने पिता के घर शरण ली और अपना व बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए एक निजी अस्पताल में नर्स के रूप में काम करना शुरू किया। अपीलकर्ता ने स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की धारा 27(1)(बी) (परित्याग) और धारा 27(1)(डी) (क्रूरता) के तहत अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, अतिरिक्त फैमिली कोर्ट संख्या 1, जमशेदपुर के समक्ष मूल वाद संख्या 59/2024 दायर किया। डाक और समाचार पत्र में नोटिस प्रकाशन के बावजूद प्रतिवादी अदालत में पेश नहीं हुआ, जिसके चलते मामला एकतरफा चला। हालांकि, 9 फरवरी 2026 को फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए वाद खारिज कर दिया कि चूंकि पति के खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, इसलिए क्रूरता साबित नहीं होती। इस फैसले के खिलाफ अपीलकर्ता ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 19(1) के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
हाईकोर्ट में अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने क्रूरता और परित्याग की कानूनी परिभाषा को समझने में गंभीर चूक की है। यह तर्क दिया गया कि नोटिस तामील होने के बावजूद उपस्थित न होकर प्रतिवादी ने एक तरह से दावों का खंडन नहीं किया। वकील ने बताया कि अपीलकर्ता ने फरवरी 2024 में गोलमुरी थाने में पति द्वारा की गई प्रताड़ना की सूचना दी थी, लेकिन पुलिस व शुभचिंतकों के समझाने के बाद भी उसने अपना आचरण नहीं सुधारा।
अपीलकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि फैमिली कोर्ट का निष्कर्ष विरोधाभासी था। फैमिली कोर्ट ने यह तो स्वीकार किया कि 15 मार्च 2018 के बाद से प्रतिवादी ने वैवाहिक संबंध बहाल करने का कोई प्रयास नहीं किया और उसका आचरण अलग रहने के इरादे (एनिमस डेसरेंडी) को दर्शाता है, फिर भी उसने परित्याग के आधार को अस्वीकार कर दिया।
हाईकोर्ट द्वारा व्यक्तिगत रूप से और स्पीड पोस्ट के जरिए नोटिस तामील कराए जाने के बावजूद प्रतिवादी उपस्थित नहीं हुआ, जिसके बाद अपील की सुनवाई भी एकतरफा की गई।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
फैमिली कोर्ट्स एक्ट की धारा 19(1) के तहत अपीलीय क्षेत्राधिकार की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले जगदीश सिंह बनाम माधुरी देवी का हवाला दिया और कहा कि प्रथम अपील पूरे मामले की पुनर्सुनवाई होती है, जिसमें तथ्यों और कानून दोनों की समीक्षा की जा सकती है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 3 का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि सिविल मामलों में निर्णय संभावनाओं की प्रबलता (प्रीपोंडरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटी) के आधार पर होता है। ए. जयचंद्र बनाम अनील कौर का उल्लेख करते हुए पीठ ने दोहराया कि संदेह से परे साबित करने का पैमाना आपराधिक मुकदमों के लिए है, पति-पत्नी के संवेदनशील रिश्तों के लिए नहीं।
निचली अदालत के फैसले में विकृति (परवर्सिटी) के बिंदु पर हाईकोर्ट ने अरुलवेलु बनाम राज्य और दामोदर लाल बनाम सोहन देवी जैसे निर्णयों पर भरोसा जताया और स्पष्ट किया कि यदि कोई निष्कर्ष साक्ष्यों की अनदेखी कर निकाला गया हो, तो वह विकृत माना जाता है और अपीलीय अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है।
स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 27(1)(डी) के तहत क्रूरता के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णयों की चर्चा की:
- डॉ. एन.जी. दास्ताने बनाम मिसेज एस. दास्ताने, जिसमें कहा गया था कि क्रूरता का आचरण ऐसा होना चाहिए जिससे मन में यह उचित आशंका पैदा हो कि साथ रहना हानिकारक या असुरक्षित होगा।
- शोभा रानी बनाम मधुकर रेड्डी, जिसमें स्पष्ट किया गया कि क्रूरता की कोई बंधी-बंधाई परिभाषा नहीं हो सकती और यह वैवाहिक दायित्वों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाला आचरण है।
- वी. भगत बनाम डी. भगत, विजय कुमार रामचंद्र भाटे बनाम नीला विजय कुमार भाटे और जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल मजूमदार, जिनमें माना गया कि गंभीर मानसिक पीड़ा और संताप पहुंचाने वाला निरंतर व्यवहार क्रूरता है।
- विश्वनाथ अग्रवाल बनाम सरला विश्वनाथ अग्रवाल, के. श्रीनिवास राव बनाम डी.ए. दीपा, रवि कुमार बनाम जुल्मीदेवी, विनीता सक्सेना बनाम पंकज पंडित और मनीष त्यागी बनाम दीपक कुमार, जिनमें कहा गया कि मानसिक क्रूरता के लिए एक ही छत के नीचे रहना जरूरी नहीं है और न ही शारीरिक हिंसा अनिवार्य है; लगातार उपेक्षा और असामान्य आचरण भी क्रूरता माना जाता है।
फैमिली कोर्ट द्वारा एफआईआर न होने के आधार पर अपीलकर्ता की गवाही खारिज करने पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की:
“इस अदालत का यह सुविचारित मत है कि वैवाहिक विवादों में जब कोई भी पक्ष, विशेष रूप से पत्नी, क्रूरता के तत्व को प्रमाणित करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करती है, तो मात्र औपचारिक प्राथमिकी दर्ज न कराने को उसकी गवाही को अविश्वसनीय मानने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अपीलकर्ता पत्नी ने भले ही औपचारिक एफआईआर दर्ज न कराई हो, लेकिन उसने प्रतिवादी पति द्वारा की गई प्रताड़ना और मारपीट को स्पष्ट रूप से बयां किया है। प्रासंगिक प्रश्न यह उठता है कि जब तक कि उसके साथ क्रूरता न की गई हो, वह स्वेच्छा से अकेले रहने और अकेलेपन व आर्थिक तंगी की कठिनाइयों को क्यों चुनेगी।”
परित्याग के मुद्दे पर पीठ ने रेडेन ऑन डिवोर्स, हाल्सबरीज़ लॉज़ ऑफ इंग्लैंड तथा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों लछमन उतमचंद कृपलानी बनाम मीना और देबानंद तामुली बनाम काकुमोनी कतकी का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि परित्याग के लिए अलगाव का तथ्य और साथ न रहने का इरादा आवश्यक है। पीठ ने रेखांकित किया कि जो व्यक्ति भौतिक रूप से घर छोड़ता है, वह हमेशा परित्याग करने वाला नहीं होता:
“उपर्युक्त परिस्थितियों में इस अदालत का यह मानना है कि अपीलकर्ता पत्नी के ससुराल से जाने को प्रतिवादी पति का जानबूझकर किया गया परित्याग नहीं माना जा सकता। बल्कि यह उसके ऊपर की गई क्रूरता के कारण उठाया गया एक विवशतापूर्ण कदम था, जो अपने आप में कानून की दृष्टि में क्रूरता के समान है।”
पीठ ने आगे कहा कि वैध नोटिस के बावजूद प्रतिवादी का अदालत में पेश न होना यह दर्शाता है कि उसे वैवाहिक रिश्ते को बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं है और यह विवाह “एक मृतप्राय लकड़ी बन चुका है, जिसे फिर से जीवित नहीं किया जा सकता।”
फैसला
हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट का आदेश रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी करने के कारण कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है। अदालत ने 9 फरवरी 2026 के आदेश और 16 फरवरी 2026 की डिक्री को निरस्त करते हुए मूल वाद मंजूर कर लिया तथा दोनों पक्षों के विवाह को भंग करने का आदेश दिया।
पीठ ने स्पष्ट किया कि दोनों नाबालिग बच्चों के उत्तराधिकार अधिकारों पर इस तलाक का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अपीलकर्ता ने स्वयं के लिए भरण-पोषण की मांग नहीं की है, जो उसकी नेकनीयती को दर्शाता है। हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह तथ्य उसे अपने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण और पढ़ाई के खर्च के लिए सक्षम फोरम के समक्ष दावा करने से नहीं रोकता, और वह इसके लिए स्वतंत्र है।
वाद संख्या: एफ.ए. संख्या 247/2026
पीठ: जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद
निर्णय की तिथि: 9 अक्टूबर, 2026

