जुवेनाइल जस्टिस कानून के तहत वैधानिक जमानत प्रावधान सामान्य आपराधिक प्रक्रिया पर प्रभावी होते हैं और जुवेनाइल को जमानत देना एक सामान्य नियम है, यह स्पष्ट करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और चिल्ड्रेंस कोर्ट, हजारीबाग के उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिनके तहत 17 वर्षीय एक जुवेनाइल को नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। यह मामला एक हिंसक झड़प से जुड़ा था जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और दो अन्य घायल हुए थे। आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने जुवेनाइल को उसके पिता के संरक्षण में जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया और टिप्पणी की कि जब सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में जुवेनाइल के खिलाफ कुछ भी प्रतिकूल नहीं पाया गया था, तब निचली अदालतें जमानत खारिज करने के वैधानिक आधारों को साबित करने में विफल रहीं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला लोहसिंघना थाना कांड संख्या 01/2026 (संबंधित जी.आर. संख्या 1031/2026) से जुड़ा है, जो भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2026 की धारा 191(2), 191(3), 126(2), 115(2), 117(2), 118(2), 324(4), 324(6), 109(1) और 103(1) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दर्ज किया गया था। यह मामला प्रधान दंडाधिकारी, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, हजारीबाग की अदालत में लंबित है।
जुवेनाइल 12 जनवरी 2026 से हिरासत में था। शुरुआत में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, हजारीबाग ने 24 फरवरी 2026 को उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसकी अपील को 26 मार्च 2026 को अपर सत्र न्यायाधीश-प्रथम सह विशेष न्यायाधीश, चिल्ड्रेंस कोर्ट, हजारीबाग ने आपराधिक अपील संख्या 63/2020 में खारिज कर दिया। इसके बाद जुवेनाइल ने अपने पिता के माध्यम से अपीलीय आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ताओं राजेश कुमार तिवारी और विश्वनाथ मून ने दलील दी कि कथित घटना की तारीख को याचिकाकर्ता की उम्र लगभग 17 वर्ष थी और वह कक्षा 11 का एक होनहार छात्र है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता पर एकमात्र आरोप बोलेरो गाड़ी का शीशा तोड़ने का है, जो केस डायरी के पैरा 73 में दर्ज चश्मदीद गवाह के बयान और एक अन्य चश्मदीद गवाह निरंजन यादव के बयान में भी सामने आया है। वकीलों ने जोर देकर कहा कि सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में भी याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ भी प्रतिकूल नहीं मिला है। इसके बावजूद निचली अदालतों ने इस आशंका के आधार पर जमानत खारिज कर दी कि वह नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे के संपर्क में आ जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के पिता इस आशय का अंडरटेकिंग देने को तैयार हैं कि वह जुवेनाइल को अच्छे आचरण और चरित्र में रखेंगे, उसे ज्ञात अपराधियों की संगति में आने से रोकेंगे और उसकी पूरी देखभाल करेंगे ताकि वह किसी भी खतरे के संपर्क में न आए।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ताओं रितेश कुमार साहू और विजय कुमार सिन्हा ने जमानत याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता अन्य आरोपियों का सहयोगी था और इस घटना में एक व्यक्ति की जान चली गई थी तथा दो लोग घायल हुए थे। इन आधारों पर राज्य सरकार ने जमानत याचिका खारिज करने की मांग की।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
विधि विवादित जुवेनाइलों की जमानत से जुड़े वैधानिक ढांचे पर विचार करते हुए जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने दोहराया कि जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 की धारा 12 सामान्य आपराधिक कानून के प्रावधानों पर प्रभावी रहती है। अदालत ने टिप्पणी की:
“जे.जे. एक्ट, 2015 की धारा 12 के अवलोकन से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि इस अधिनियम की धारा 12 दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 या उस समय लागू किसी भी अन्य कानून में दिए गए जमानत प्रावधानों पर प्रभावी है। यह भी पूरी तरह स्पष्ट है कि जुवेनाइल को जमानत देना एक नियम है और इससे इनकार करना अपवाद है। किसी जुवेनाइल को केवल इन तीन आधारों पर जमानत से वंचित किया जा सकता है: (i) यदि यह विश्वास करने के उचित आधार दिखते हों कि रिहाई से वह व्यक्ति किसी ज्ञात अपराधी के संपर्क में आ सकता है, या (ii) उक्त व्यक्ति नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे के संपर्क में आ सकता है, या (iii) उस व्यक्ति की रिहाई से न्याय के उद्देश्य विफल हो जाएंगे। अधिनियम की धारा 12 बिना किसी भेदभाव के कानून के उल्लंघन में आए सभी जुवेनाइलों पर लागू होती है।”
निचली अदालतों द्वारा जमानत खारिज करने के आधारों पर बात करते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि निचली अदालतों ने इस आशंका पर याचिका खारिज की थी कि जुवेनाइल अपराधियों के संपर्क में आएगा और नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे का सामना करेगा, जबकि सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में उसके खिलाफ कोई भी प्रतिकूल सामग्री नहीं पाई गई थी।
हाईकोर्ट ने आगे टिप्पणी की:
“उचित आधारों से जुड़ी किसी भी सामग्री या साक्ष्य के अभाव में यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी रिहाई से न्याय के उद्देश्य विफल होंगे, और विद्वान अदालतें पुनरीक्षणकर्ता को जमानत से इनकार करने के लिए तीनों परिस्थितियों पर कारण बताने में विफल रही हैं। जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और अपीलीय अदालत द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्ष यह हैं कि याचिकाकर्ता दुर्दांत अपराधियों के संपर्क में आएगा। इस प्रकार, विद्वान अपर सत्र न्यायाधीश-प्रथम सह विशेष न्यायाधीश, चिल्ड्रेंस कोर्ट, हजारीबाग द्वारा क्रिमिनल अपील संख्या 63/2020 में पारित आदेश दिनांक 26.03.2026 और साथ ही जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, हजारीबाग द्वारा पारित आदेश दिनांक 24.02.2026 कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं हैं। इसलिए इन दोनों आदेशों को रद्द किया जाता है और यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की जाती है।”
अदालत का निर्णय और रिहाई की शर्तें
दोनों आक्षेपित आदेशों को निरस्त करते हुए हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि पुनरीक्षणकर्ता को उसके प्राकृतिक संरक्षक/पिता द्वारा दिए गए आश्वासन और मुचलके पर, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, हजारीबाग की संतुष्टि के अनुरूप रिश्तेदारों की दो जमानतों के साथ पिता द्वारा व्यक्तिगत बंधपत्र प्रस्तुत करने पर जमानत पर रिहा किया जाए।
हाईकोर्ट ने रिहाई के लिए निम्नलिखित शर्तें तय कीं:
- प्राकृतिक संरक्षक/पिता को यह अंडरटेकिंग देना होगा कि जमानत पर रिहा होने के बाद पुनरीक्षणकर्ता को किसी भी ज्ञात अपराधी के संपर्क या संगति में नहीं आने दिया जाएगा, न ही उसे किसी नैतिक, शारीरिक या मानसिक खतरे के संपर्क में आने दिया जाएगा, और पिता यह सुनिश्चित करेंगे कि जुवेनाइल दोबारा अपराध न दोहराए।
- पिता को यह भी अंडरटेकिंग देना होगा कि जुवेनाइल उचित स्तर पर अपनी पढ़ाई जारी रखेगा, जिसके लिए उसे अन्य रचनात्मक गतिविधियों के साथ-साथ प्रोत्साहित किया जाएगा, और उसे अनुत्पादक व अत्यधिक मौज-मस्ती में समय बर्बाद नहीं करने दिया जाएगा।
- जुवेनाइल और उसके पिता नवंबर 2026 के पहले सोमवार से शुरू होकर प्रत्येक कैलेंडर माह के पहले सोमवार को प्रोबेशन अधिकारी के समक्ष रिपोर्ट करेंगे (यदि किसी माह का पहला सोमवार अवकाश का दिन हो, तो अगले कार्यदिवस पर)।
- प्रोबेशन अधिकारी जुवेनाइल की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखेंगे और नियमित रूप से सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट तैयार कर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, हजारीबाग को समय-समय पर प्रस्तुत करेंगे, जैसा बोर्ड निर्धारित करे।
इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए निस्तारित कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: XXX बनाम झारखंड राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 900/2026
पीठ: जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी
निर्णय की तिथि: 06.10.2026

