जमीन से सम्बंधित वाद नही सुन सकेंगे राजस्व कोर्ट

देहरादून–उत्तराखंड में जमीनी वादों में निस्तारण की प्रक्रिया में बड़ा फेरबदल होने वाला है। अब लैंड रेवेन्यू एक्ट 1901 के सेक्शन 28 के अंतर्गत विभिन्न राजस्व कोर्ट भूमि मामलों की सुनवाई नही कर पाएंगे। इस सेक्शन में विशेषकर खसरा, खतौनी, संबधी वाद प्रकरण आते है। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने संजय गुप्ता बनाम गढ़वाल मंडल के मामले में यह आदेश जारी किया है। लैंड रेवेन्यू एक्ट संबंधी प्रकरण अब सिविल कोर्ट के समक्ष दाखिल किए जा सकेंगे।

हाई कोर्ट के आदेश के क्रम में डीएम देहरादून मंडलायुक्त गढ़वाल और उत्तराखंड राजस्व परिषद ने भी संबंधित प्रकरण में सुनवाई करने से हाथ खींच दिए है। हालांकि राजस्व विभाग ने लोअर कोर्ट में अभी यह व्यवस्था लागू नही की जा सकी है। अपर जिलाधिकारी कोर्ट,उपजिलाधिकारी कोर्ट व तहसील सदर की विभिन्न कोर्ट में अभी भी इस तरह के वाद गतिमान है। इस तरह के कुछ मामले जिलाधिकारी कोर्ट में भी गतिमान है।

पूर्व में नगर निकाय क्षेत्रों में राजस्व वादों का अधिकार उत्तराखंड सरकार एक गजट नोटिफिकेशन के तहत समाप्त कर चुकी थी। इसके बाद भी निचले स्तर पर नोटिफिकेशन को लागू नही कराया जा सका। इतना जरूर है कि हाई कोर्ट के आदेश के उपरांत अब राजस्व की विभिन्न हाई कोर्ट ने राजस्व वादों को खारिज करना शुरू कर दिया है। 

अगर हाई कोर्ट के आदेश को जनता की नजर से देखा जाय तो इसमें आमजन को बड़ी राहत मिलेगी। क्योंकि राजस्व अधिकारियों के समक्ष प्रशासनिक जिम्मेदारी भी होती है। इसके चलते तमाम वादों में केवल तारीख ही हिस्से में आती है। मौजूदा वक्त में दून के छः राजस्व कोर्ट में हजारों की तादाद में केस गतिमान है। इनमे 90 प्रतिशत मामले देहरादून नगर निगम क्षेत्र के ही है।

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वैसे भी तहसील सदर का तकरीबन 90 फीसद भाग भी नगर निगम के क्षेत्र में आता है। इन कोर्ट की कार्यप्रणाली देखी जाए तो वादों के निस्तारण में लंबा वक्त लग जाता है। राजस्व न्यायालय में कोर्ट फीसद के रूप में अच्छी खासी रकम जमा करने की बाध्यता न होने के चलते भी कई मर्तबा जमीनी विवाद अनावश्यक रूप से भी दाखिल कर दिए जाते है। 

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