कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक पुरुष के खिलाफ द्विविवाह (Bigamy) और वैवाहिक क्रूरता की आपराधिक कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि गैर-न्यायिक स्टांप पेपर पर निष्पादित “संविदात्मक समझौता” हिंदू कानून के तहत वैध विवाह नहीं माना जा सकता। न्यायमूर्ति उदय कुमार ने स्पष्ट किया कि ऐसा समझौता कानूनी रूप से शून्य (legal nullity) है और इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 और 498A के तहत दंडात्मक दायित्व का आधार नहीं बनाया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने निचली अदालत में लंबित जी.आर. केस संख्या 5501/2014 को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। मामले की शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता के साथ उसके संबंधों ने 27 जून, 2011 को वैवाहिक रूप ले लिया था। अपनी प्रारंभिक प्राथमिकी (FIR) में, शिकायतकर्ता ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह “विवाह” केवल गैर-न्यायिक स्टांप पेपर पर हस्ताक्षर के माध्यम से संपन्न हुआ था, जिसमें सप्तपदी जैसी किसी भी पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन नहीं किया गया था।
लगभग तीन वर्षों तक साथ रहने के बाद, याचिकाकर्ता ने 26 जुलाई, 2014 को एक अन्य महिला के साथ औपचारिक रूप से पंजीकृत विवाह कर लिया। इससे क्षुब्ध होकर शिकायतकर्ता ने आपराधिक मामला दर्ज कराया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उसे विवाह के झूठे विश्वास में रखा गया और बाद में क्रूरता की गई। हालांकि, जांच के दौरान गवाहों ने “मंदिर में विवाह” होने का दावा किया, जो FIR में दर्ज “स्टांप पेपर विवाह” के मूल संस्करण के बिल्कुल विपरीत था।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता का पक्ष: याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि आईपीसी की धारा 494 (द्विविवाह) के तहत अभियोजन के लिए पहले विवाह का कानूनी रूप से वैध होना अनिवार्य है। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत एक “संविदात्मक” मिलन शून्य है क्योंकि इसमें अनिवार्य धार्मिक अनुष्ठानों का अभाव है। धारा 498A (क्रूरता) के संबंध में यह दलील दी गई कि “पति” का दर्जा केवल कानूनी विवाह से ही प्राप्त हो सकता है, जो इस मामले में मौजूद नहीं था।
राज्य का पक्ष: राज्य की ओर से उपस्थित अतिरिक्त लोक अभियोजक ने तर्क दिया कि FIR पूरे मामले का विस्तृत विश्वकोश नहीं होती है और प्रारंभिक शिकायत में रस्मों का उल्लेख न होने का अर्थ यह नहीं है कि वे नहीं हुई थीं। राज्य ने रीमा अग्रवाल बनाम अनुपम (2004) 3 SCC 199 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अपराधियों को तकनीकी आधार पर बचने से रोकने के लिए “पति” शब्द की व्यापक व्याख्या की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 और 7 के वैधानिक प्रावधानों का अवलोकन किया। न्यायमूर्ति कुमार ने टिप्पणी की कि धारा 7 विवाह के रूप और उसकी आत्मा को निर्धारित करती है।
कोर्ट ने कहा, “समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करके किया गया विवाह इस अधिनियम के तहत मान्यता प्राप्त प्रक्रिया नहीं है… इसमें सहवास को विवाह में बदलने के लिए आवश्यक ‘कानूनी कीमिया’ (legal alchemy) का अभाव है। इसके विपरीत मानना एक स्टांप पेपर के टुकड़े को सप्तपदी की पवित्रता प्रदान करने जैसा होगा।”
द्विविवाह (धारा 494 IPC) पर: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले भाउराव शंकर लोखंडे बनाम महाराष्ट्र राज्य (AIR 1965 SC 1564) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 494 में “विवाह” शब्द का अर्थ उचित रस्मों के साथ मनाया गया विवाह है। चूंकि शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया कि मिलन “स्टांप पेपर” पर आधारित था, इसलिए विवाह के कानूनी अस्तित्व के अभाव में द्विविवाह का आरोप लगाना असंभव है।
वैवाहिक क्रूरता (धारा 498A IPC) पर: कोर्ट ने तकनीकी रूप से शून्य विवाह (जहां रस्में हुईं लेकिन कानूनी बाधा मौजूद थी) और शुरू से ही गैर-कानूनी मिलन के बीच अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि रीमा अग्रवाल मामले में दी गई सुरक्षा केवल पूर्ववर्ती स्थितियों पर लागू होती है, न कि ऐसे समझौतों पर जिन्हें कानून शुरू से ही मान्यता नहीं देता। स्टांप पेपर पर किया गया एक धर्मनिरपेक्ष अनुबंध पार्टियों को धारा 498A के उद्देश्य के लिए “पति-पत्नी” का दर्जा नहीं देता।
कोर्ट ने FIR के “स्टांप पेपर विवाह” से गवाहों के बयानों में “मंदिर विवाह” की ओर बदलाव को कानूनी कमी को छिपाने का एक “अस्पष्ट प्रयास” करार दिया।
अदालत का निर्णय
कलकत्ता हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कानून के निम्नलिखित बिंदु स्पष्ट किए:
- हिंदू कानून के तहत स्टांप पेपर पर किया गया “संविदात्मक विवाह” कानूनी रूप से शून्य है।
- धारा 494 IPC के तहत अभियोजन के लिए पहले विवाह के विधिपूर्वक संपन्न होने का ठोस प्रमाण अनिवार्य है।
- धारा 498A IPC के तहत “पति” का दर्जा उस पक्ष पर नहीं थोपा जा सकता जहां विवाह का अस्तित्व शुरू से ही कानूनी रूप से शून्य हो।
अदालत ने शिकायतकर्ता को घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 जैसे अन्य वैधानिक प्रावधानों के तहत कानूनी उपाय खोजने की स्वतंत्रता दी है, यह स्पष्ट करते हुए कि वह “विवाह की प्रकृति वाले संबंध” के लिए उपलब्ध नागरिक उपचारों की मांग कर सकती है।
- केस का शीर्षक: दीप डे बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (Deep Dey vs. State of West Bengal & Anr.)
- केस संख्या: CRR 2190 OF 2017

