पूर्व से मुद्रित प्रपत्र पर रिक्त स्थानों को पूर्ण करके पारित सम्मन अवैधानिक है: Allahabad HC

Allahabad High Court के नवीनतम निर्णयों में माननीय न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी का निर्णय है, जिसकी खासियत ये है कि यह पूरा निर्णय हिन्दी में लिखा गया है।

सामान्यतः हाईकोर्ट में सभी निर्ण अंग्रेजी भाषा में लिखे जाते है।

इस निर्णय के मुख्य तथ्य इस प्रकार हैः

भारतीय दंड प्रक्रिया की धारा 482 के अंतर्गत एक याचिका दाखिल की गयी, जिसमें यह प्रार्थना की गयी कि, सम्मन आदेश दिनांक 20.06.2020 एवं इसके फलस्वरूप समस्त कार्यवाही को रद्द किया जाये।

अंशुल कुमार सिंघल, आवेदक के अधिवक्ता ने कथन किया कि न्यायालय मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट, गाजियाबाद ने बिना अपने न्यायिक मानस का उपयोग करे, यांत्रिक रूप से अपराध का संज्ञान, धारा 190 (बी) दं0प्र0सं0 के अंतर्गत लिया है और आवेदक के विरूद्व एक पूर्व में मुद्रित प्रपत्र पर रिक्त स्थानों पर सम्मन की तिथि व मुकदमें का विवरण लिख कर सम्मन जारी किया है।

अपने कथन के समर्थन में न्यायालय के दृष्टान्त अंकित बनाम उत्तर प्रदेश सरकार 2010 (1) जे.आई.सी, 432 को उद्वत किया जिसमें, पूर्व मुद्रित प्रपत्र पर संज्ञान लेने की परिपाटी की आलोचना की गयी है और ऐसा संज्ञान जिसमें न्यायिक मानस का उपयोग नहीं किया गया है, को रद्द किया गया है।

अधिवक्ता ने यह भी निवेदन किया कि यह कृत न्यायालय की कार्यवाही का दुरूपयोग है। अतः यह उच्च न्यायालय अपनी अन्तर्निहित शक्तियां का उपयोग करते हुए आक्षेपित सम्मन आदेश व उसके फलस्वरूप समस्त कार्यवाही को रद्द करें।

सरकार के अधिवक्ता ने उपरोक्त याचिका का विरोध किया और कहा कि संज्ञान लेते समय न्यायालय को कोई विस्तृत आदेश पारित करने की आवश्यकता नहीं है। आक्षेपित आदेश में यह स्पष्ट रूप से लिखित है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट, केस डायरी एवं अन्य अभियोजन प्रपत्रों का अवलोकन करने के बाद ही अपराध का संज्ञान लिया गया। अतः आक्षेपित आदेश में कोई वैधानिक़ ऋृटि नहीं है।

Allahabad High Court का विशलेषण

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता, की धारा 482, उच्च न्यायालय की अन्तर्निहित

शक्तियों की व्यावृत्ति के प्रावधान के सम्बंध में है जो निम्न है,-

‘‘इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अन्तर्निहित शक्ति को सीमित या प्रभावित करने वाली समझी जाएगी जैसे इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरूपयोग निवारित करने के लिए या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिस्चित करने के लिए आवश्यक हो।”

उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को इस संहिता के किसी प्रावधान से सीमित नहीं किया जा सकता है। यह वो अंतर्निहित शक्तियां हैं, जो इस संहिता के तहत किसी भी आदेश को प्रभावी करने के लिए, या किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया का दुरूपयोग रोकने के लिए या अन्यथा सुरक्षित करने के लिए या न्याय की प्राप्ति के लिए आवश्यक हों। 

यह शक्तियां इस संहिता के तहत उच्च न्यायालय को नहीं प्राप्त होती हैं, बल्कि यह शक्तियां उच्च न्यायालय में अन्तर्निहित हैं, जिसे मात्र संहिता के एक प्रावधान द्वारा घोषित किया गया है।

होईकोर्ट ने कहा कि धारा 190 द0प्र0सं0 के अंतर्गत संज्ञान लेना एक गंभीर प्रक्रिया है जिसको यांत्रिक रूप से नहीं लिया जा सकता है। न्यायालय को पत्रावली पर उपस्थित दस्तावेजों का परीशीलन कर,मैजिस्ट्रेट को अपने न्यायिक मानस का उपयोग करके ही इस धारा के अंतर्गत अपराध का संज्ञान लेना चाहिए।

कोर्ट ने यह माना कि यह सही है कि संज्ञान लेते समय विस्तृत सकारण आदेश लिखने की आवश्यकता नहीं है परन्तु न्यायालय को यह संतुष्टि होनी चाहिये और आदेश में परिलक्षित भी होनी चाहिए कि प्रकरण में संज्ञान लेने के पर्याप्त आधार है। हाईकोर्ट ने आदेश के परिशीलन से पाया कि निचली अदालत के आदेश से यह पूर्णतः स्पष्ट है कि अवर न्यायालय ने अपने न्यायिक मानस का उपयोग करे बिना ही एक पर्वू में मुद्रित प्रपत्र पर यांत्रिक रूप से रिक्त

स्थानों को भरके आक्षेपित सम्मन का आदेश पारित किया है जो इस न्यायालय द्वारा पारित विभिन्न आदेशों के विरूद्व है। कोर्ट ने अवधेष बनाम उ0प्र0 सरकार व अन्यः 2019 (6) ए.डी.जे, 667 का प्रस्तर 12,13 एवं 16; सौरभ दीवाना बनाम उ0प्र0 सरकारः 2010(3) ए.डी.जे. 622; व सुदेष भदौरिया बनाम उ0प्र0 सरकार व अन्यः 2020(8) ए.डी. जे. 54) पर निर्भर किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेश को यांत्रिक रूप से पूर्व में मुद्रित प्रपत्र पर रिक्त स्थानों को पूर्ण करके पारित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसी प्रवृत्ति की, इस उच्च न्यायालय ने अपने आदेशों में निन्दा की है। ऐसे आदेश की पुनारावति की अनुमति नहीं दी जा सकती है। यह न केवल न्यायिक मानस का उपयोग न करना दर्शाता है बल्कि न्यायिक मानदंडो के प्रतिकूल भी है।

माननीय न्यायमूर्ति ने कहा कि ऐसी प्रथा को तत्काल रोक देना चाहिये। उपरोक्त विश्लेषण में हाईकोट ने यह स्पष्ट पाया कि वर्तमान प्रकरण में, इस न्यायालय की अन्तर्निहित शक्तियाँ का उपयोग करना उचित है क्योंकि आक्षेपित आदेश के कारण न्यायालय की कार्यवाही का दुरूपयोग हुआ है।

अतः आक्षेपित आदेश दि0 20.06.2020 (सम्मन आदेश) निरस्त किया गया तथा अवर न्यायालय को पत्रावली इस निर्देष के साथ वापिस की गयी कि धारा 190(2) दं0प्र0सं0 के अंतर्गत उपरोक्त विश्लेषण व निष्कर्ष को ध्यान में रखकर पुनः आदेश पारित करें।

वादः आवेदन अन्तर्गत धारा 482 संख्या- 13883 / 2020 

आवेदकः- आशू रावत

माननीय न्यायधीश का नाम- माननीय न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी,

विपक्षीः- उत्तर प्रदेश सरकार एवं एक और आवेदक के अधिवक्ताः- अंशुल कुमार सिंघल

विपक्षी के अधिवक्ताः- शासकीय अधिवक्ता

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