घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही के खिलाफ धारा 482 सीआरपीसी की याचिका पोषणीय नहीं

केरल उच्च न्यायालय के नवीनतम निर्णय में, 15 सितंबर 2020 को, केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पी.बी. सुरेश कुमार ने एक घरेलू हिंसा मामले में अपना निर्णय पारित किया।

न्यायालय ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत कार्यवाही के खिलाफ धारा 482 सीआरपीसी के तहत एक याचिका दाखिल की जा सकती है कि नहीं, पर अपना निर्णय दिया।

संक्षिप्त तथ्य

इस मामले में विपक्षी महिला ने अपने ससुराल वालों और पति के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, होसडबर्ग के समक्ष घरेलू हिंसा का मामला दर्ज कराया। यह आरोप लगाया गया था कि पति के परिवार के सदस्य उसके साथ बुरा व्यवहार कर रहे था, और जब वह गर्भवती थी तब भी उसकी कोई देखभाल नहीं की गई थी। यह भी आरोप लगाया गया कि उसके पति और ससुराल वालों ने पीड़िता के पास मौजूद सभी सोने के गहने ले लिए।

न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया और पति पत्नी को 10000 रूपये प्रति माह का भुगतान करेगा साथ ही साथ 5000 रूपये माह का भुगतान पत्नी को और करेगा जिससे वो बच्चे की देखभाल कर सके।
उक्त से कार्यवाही से क्षुब्ध होकर पति तथा उसके परिवार द्वारा केरल उच्च न्यायलय में धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दायर करते हुए मॉग की कि घरेलू हिसंा अधिनियम के अन्तर्गत दर्ज वाद को निरस्त किया जाये।

पक्ष-विपक्षी दलों द्वारा तर्क

याचिकाकर्ताओं (पति की बहन और मां) के वकील ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ आरोप अस्पष्ट थे, और उनके खिलाफ घरेलू हिंसा का कोई मामला नहीं बनाया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि विचाराधीन मुद्दा तुच्छ था और पति के परिवार पर दबाव डालने के लिए इतना बड़ा बना दिया गया है। उन्होंने अदालत को यह भी कहा कि उन्हें जारी किए गए नोटिस पूर्णतया अनुचित थे।

उत्तरदाताओं के वकील (पत्नी) ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने अदालत की कार्यवाही में देरी करने के इरादे से वर्तमान मामला धारा 482 सीआरपीसी में दायर किया गया है।

यह भी प्रस्तुत किया गया ा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आरोप वास्तविक है और उनके खिलाफ दायर घरेलू हिंसा का एक भी मामला अनुचित नहीं है।

कोर्ट का फैसला

कोर्ट ने विजयलक्ष्मी अम्मा बनाम बिंदू में केरल हाईकोर्ट के जजमेंट का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत कार्यवाही की गई है, तो वह सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में याचिका नहीं दायर कर सकता।

न्यायालय ने यह भी माना कि घरेलू हिंसा के मामलों में, दूर के रिश्तेदारों या ऐसे लोगों को भी वादी बना दिया जाता है, जिनका अपराध से कोई संबंध नहीं है, परिवार के सदस्यों पर दबाव बनाने और राहत पाने के लिए की गयी एसी कार्यवाही उचित नहीं है।

उच्च न्यायालय द्वारा सुप्रीम कोट के प्रीति गुप्ता बनाम स्टेट ऑफ झारखंड (2010) 7 एससीसी 667 के जजमेंट का भी संदर्भ दिया गया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि घरेलू हिसंका के अधिकांश मामलों को वकीलों की सलाह पर या उनकी सहमति से दायर किया जाता है।

इसके अलावा अदालत ने कहा कि डीवी अधिनियम के तहत दायर सभी आवेदनों की जांच की जानी चाहिए और सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लोगों को अस्पष्ट और पुष्ट आरोपों के आधार पर हर पार्टी के रूप जोड़ा जाये।
हालांकि हाईकोर्ट ने मामला खारिज कर दिया गया तथा हाईकोर्ट ने विजयलक्ष्मी मामले का उल्लेख करते हुए याचिकाकर्ताओं को मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन करने की स्वतंत्रता दी। विजयलक्ष्मी मामले के आलोक में अनुरोधों पर विचार करने के लिए मजिस्ट्रेट को भी निर्देशित किया गया है।

Case Details-

Case Title: Sheeja K Vs P.c Jayadev & Ors.

Case No.: OP(Crl.).No.234 OF 2019 and Crl.MC.No.7977 OF 2018(F)

Date of Order: 15.09.2020

Quorum: Hon’ble Mr. Justice P.B Suresh Kumar

Appearance: Sri.S.Rajeev Sri.K.K.Dheerendra Krishnan Sri.V.B.Unniraj Sri.V.Vinay Sri.D.Feroze Sri.K.Anand And Sri.Suresh Kumar Kodoth Sri.K.P.Antony Binu

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