अभियुक्त मात्र चार्जशीट दाखिल हो जाने पर धारा 164 का बयान प्राप्त नहीं कर सकता: SC

Supreme Court की तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने यह प्रतिपादित किया है कि मात्र आरोप पत्र दाखिल हो जाने से अभियुक्त को धारा 164 के तहत दर्ज बयान एवं संबंधित दस्तावेजों की प्रतियां प्राप्त करने का अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में  धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान की गोपनीयता बनाए रखने में उच्च न्यायालय पूरी तरह से विफल रहा है।

अपीलार्थी के पिता ने पुलिस स्टेशन कोतवाली, जिला शाहजहाँपुर में इस आशय की शिकायत दर्ज कराई कि उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर अपनी बेटी (अपीलकर्ता) का एक वीडियो देखा था, जिसमें वह आरोप कह रही थी कि प्रतिवादी संख्या 2 और कुछ अन्य व्यक्ति उनकी बेटी और अन्य लड़कियों का यौन शोषण कर रहे है।

यह भी आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता संपर्क करने योग्य नहीं थी, और अपीलकर्ता की जान कोखतरा था; इसलिए मामले में त्वरित कार्रवाई की जाए।

आईपीसी की धारा 506 और 364 के तहत अपराध के संबंध में उपरोक्त शिकायत पर एफआईआर नंबर 45/2009 दर्ज की गई थी।

फेसबुक वीडियो के वायरल होने के बाद, कुछ अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया।

उसके बाद, 30.08.2019 को सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि लड़की का पता राजस्थान राज्य के जिला दौसा में लगाया गया है। 30.08.2019 को, अपीलकर्ता ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपना बयान दर्ज किया कि वह उत्तर प्रदेश वापस नहीं जाना चाहती थी लेकिन दिल्ली में अपने माता-पिता से मिलना चाहती थी।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि आईजी रैंक के पुलिस अधिकारी की अध्यक्षता में एक एसआईटी का गठन किया जाये, जोकि अपीलकर्ता द्वारा व्यक्त की गई शिकायतों और उसके माता-पिता द्वारा व्यक्त की गई शिकायतों के बारे में जॉच करें।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी जाँच की निगरानी के लिए एक विशेष पीठ गठित करने का अनुरोध किया और यह भी अनुरोध किया कि परिवार के सदस्यों को दी गई सुरक्षा की समीक्षा करने संबंधित उचित आदेश पारित करे।

तदनुसार, एसआईटी का गठन किया गया और 16.09.2020 को, न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 164 सीआरपीसी के प्रावधानों के तहत अपीलकर्ता का बयान दर्ज किया गया था।

17.09.2019 को, अपीलकर्ता ने एक आवेदन दायर किया जिसमें आरोप लगाया गया कि धारा 164 सीआरपीसी के तहत उसका बयान दर्ज करने में कुछ खामियां थीं। उसी दिन, एक अन्य आवेदन प्रतिवादी नंबर 2 द्वारा दाखिल किया गया था, जिसमें सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज अपीलकर्ता के बयान की एक प्रमाणित प्रति की मांग की गयी थी।

जिला एवं सत्र न्यायालय द्वारा कर्नाटक राज्य द्वारा नॉनवाइनकेरे पुलिस बनाम शिवन्ना उर्फ तारकरी शिवन्ना (2014) 8 एससीसी 913 पर भरोसा करते हुए आवेदन को खारिज कर दिया गया।

उसके बाद, विपक्षी संख्या 2 को गिरफ्तार किया गया, और उनकी जमानत अर्जी को 23.09.2019 को सीजेएम, शाहजहाँपुर ने खारिज कर दिया।

22.10.2012 को विपक्षी संख्या 2 ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक विविध आवेदन दायर किया, जिसमें जिला एवं सत्र न्यायालय के आदेश जिससे धारा 164 के बयान को देने से मना किया गया था को चुनौती दी गयी। तत्पश्चात एसआईटी ने 05.11.2019 को आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया।

चार्जशीट के अनुसार प्रतिवादी संख्या 2 ने आईपीसी की धारा 354 डी, 342, 506 और 376 सी के तहत दंडनीय अपराध किए थे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 07.11.2019 से प्रतिवादी की याचिका स्वीकर की और इससे पहले कि विशेष अवकाश याचिका दायर की जाती, धारा 164 के तहत अपीलकर्ता के दर्ज बयान की एक प्रति विपक्षही संख्या 2 को प्रदान कर दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक राज्य द्वारा नॉनवाइनकेरे पुलिस बनाम शिवन्ना उर्फ तारकरी शिवन्ना (2014) 8 एससीसी 913 के मामले में निर्णय से यह स्पष्ट है कि न्यायालय ने निर्देश दिया कि धारा 164 के तहत दर्ज पीड़िता के बयान की एक प्रति संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच अधिकारी को सौंप दी जाये और धारा 173 के तहत रिपोर्ट दाखिल होने तक किसी भी व्यक्ति को इसका खुलासा नहीं किया जाना चाहिए।

इसके अलावा, माननीय न्यायाधीशों ने देखा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों की योजना से पता चलता है कि जांच के पूरा होने के बाद, सीआरपीसी की धारा 173 के तहत एक रिपोर्ट पुलिस द्वारा दर्ज की जानी चाहिए, इसके बाद सीआरपीसी की धारा 190 के संदर्भ में, संबंधित मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट पर विचार कर किसी भी अपराध का संज्ञान ले सकते हैं।

यह आगे कहा गया है कि सक्षम न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने और प्रक्रिया जारी करने के बाद ही आरोपी को संहिता के 207 और धारा 208 के उल्लेखित दस्तावेजों की प्रतियों का हकदार माना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक ऊपर बताए गए चरण समाप्त नहीं हो जाते, तब तक चार्जशीट दाखिल करना, अभियुक्त को किसी भी संबंधित दस्तावेज की प्रतियां प्राप्त करने का अधिकार नहीं देता है, जिसमें सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज बयान शामिल है।

माननीय न्यायाधीशों ने आगे कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय यौन शोषण जैसे मामले में आवश्यक गोपनीयता बनाए रखने में पूरी तरह से विफलता दिखाई है।

उपरोक्त के मद्देनजर, सर्वाेच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया और यह कहा कि कि किसी भी परिस्थिति में संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज बयानों की प्रतियों को तब तक प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है जब तक कि न्यायालय मामले में संज्ञान लेने के बाद उचित आदेश पारित न कर दे।

Case Details

Title- Miss A vs State of U.P.

Case No.- Criminal Appeal 659 of 2020

Coram- Hon’ble Justice U.U. Lalit, Hon’ble Justice Vineet Saran and Hon’ble Justice S.Ravindra Bhat

Date of Judgment- 08.10.2020

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