धारा 313 CrPC के तहत आरोपी का बयान शिकायतकर्ता के दावों की पुष्टि कर सकता है: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में सजा बरकरार रखी

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस (धारा 138 एनआई एक्ट) के एक मामले में दोषी पाए गए एक बीमा एजेंट की पुनर्विचार याचिका (Revision Petition) को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 313 के तहत दर्ज आरोपी का बयान अभियोजन के मामले का समर्थन करता है, तो उसे सबूतों को विश्वसनीयता प्रदान करने और सजा का आधार बनाने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

जस्टिस राकेश कैंथला की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एक बार जब चेक जारी करने और उस पर हस्ताक्षर की बात स्वीकार कर ली जाती है, तो एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत कानूनी उपधारणा (Presumption) लागू हो जाती है। ऐसी स्थिति में यह आरोपी की जिम्मेदारी है कि वह साक्ष्यों के माध्यम से एक संभावित बचाव (Probable Defence) पेश करे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद पदम नाथ (अब दिवंगत) द्वारा निक्का राम के खिलाफ दायर एक शिकायत से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता निक्का राम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी में एक बीमा एजेंट के रूप में कार्यरत था। उसने शिकायतकर्ता के वाहन का बीमा किया था, लेकिन एक “टाइपिंग मिस्टेक” के कारण वाहन का बीमा मूल्य 9,00,000 रुपये से घटाकर केवल 80,000 रुपये कर दिया गया।

वाहन के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद, आरोपी ने शिकायतकर्ता को नुकसान की भरपाई के लिए 1,00,000 रुपये देने का वादा किया और इस राशि का एक चेक जारी किया। जब इस चेक को पंजाब नेशनल बैंक में भुगतान के लिए लगाया गया, तो यह “अपर्याप्त फंड” (Insufficient Funds) के कारण बाउंस हो गया। कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद भुगतान न होने पर मामला कोर्ट पहुंचा।

करसोग के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 2 जुलाई 2022 को निक्का राम को दोषी ठहराते हुए छह महीने के साधारण कारावास और 1,50,000 रुपये मुआवजे की सजा सुनाई थी। इस फैसले को दिसंबर 2023 में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-I, मंडी ने भी बरकरार रखा था।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील श्री प्रीतम सिंह चंदेल ने तर्क दिया कि चूंकि वाहन का बीमा कंपनी द्वारा किया गया था, इसलिए एजेंट होने के नाते आरोपी की कोई व्यक्तिगत देनदारी नहीं बनती थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि शिकायतकर्ता ने आरोपी से चेक “झपट” लिया था और वास्तव में आरोपी पर कोई कर्ज नहीं था।

राज्य की ओर से पेश श्री अजीत शर्मा (उप महाधिवक्ता) ने कहा कि यह मुख्य रूप से निजी पक्षों के बीच का विवाद है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र (Revisional Jurisdiction) का दायरा सीमित है और इसका उपयोग केवल क्षेत्राधिकार की त्रुटि या स्पष्ट कानूनी खामियों को सुधारने के लिए किया जाना चाहिए।

धारा 313 CrPC के तहत बयान की अहमियत

हाईकोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि ट्रायल के दौरान आरोपी ने स्वयं क्या स्वीकार किया था। कोर्ट ने कहा:

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“धारा 313 CrPC के तहत आरोपी द्वारा दिए गए उत्तर शिकायतकर्ता के पक्ष की पुष्टि करते हैं।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के महाराष्ट्र राज्य बनाम सुखदेव सिंह और मोहन सिंह बनाम प्रेम सिंह जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हालांकि धारा 313 के तहत बयान शपथ पर नहीं होते, फिर भी उन्हें संज्ञान में लिया जा सकता है। जस्टिस कैंथला ने सुप्रीम कोर्ट के हवाले से कहा:

“जहां आरोपी इस अवसर का लाभ उठाता है, वहां धारा 313 CrPC के तहत उसके द्वारा दिए गए बयान, जहां तक वे अभियोजन के मामले का समर्थन करते हैं, सजा सुनाने के लिए उसके खिलाफ इस्तेमाल किए जा सकते हैं।”

आरोपी ने अपने बयान में स्वीकार किया था कि टाइपिंग की गलती से बीमा राशि कम हुई थी और उसने 1,00,000 रुपये देने का समझौता किया था।

चेक की कानूनी उपधारणा

कोर्ट ने एनआई एक्ट के “रिवर्स ओनस” (प्रमाण का उल्टा बोझ) सिद्धांत को दोहराया। एपीएस फॉरेक्स (पी) लिमिटेड बनाम शक्ति इंटरनेशनल फैशन लिंकर्स मामले का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“…एक बार जब चेक जारी करना और उस पर हस्ताक्षर स्वीकार कर लिए जाते हैं, तो हमेशा शिकायतकर्ता के पक्ष में यह उपधारणा होती है कि चेक कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण या देनदारी के बदले जारी किया गया था।”

कोर्ट ने “चेक झपटने” के बचाव को भी खारिज कर दिया, क्योंकि आरोपी द्वारा स्वयं दर्ज कराई गई पुलिस रिपोर्ट (Ex. DW-1/A) में उल्लेख था कि चेक समझौते के तहत दिया गया था।

एजेंट की जिम्मेदारी पर स्पष्टीकरण

हाईकोर्ट ने इस दलील को भी अस्वीकार कर दिया कि आरोपी केवल एक एजेंट था। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने अपनी गलती (टाइपिंग एरर) से हुए नुकसान की भरपाई के लिए शिकायतकर्ता के साथ एक स्वतंत्र समझौता किया था, जो बीमा कंपनी के साथ हुए मुख्य अनुबंध से अलग था।

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कोर्ट का निर्णय

छह महीने की जेल की सजा को उचित ठहराते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 138 के दंडात्मक प्रावधानों का उद्देश्य चेक की विश्वसनीयता बनाए रखना है। 1,50,000 रुपये के मुआवजे पर हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कलमणि टेक्स बनाम पी. बालसुब्रमण्यम मामले के निर्देशों के अनुसार, चेक राशि से दोगुने तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, इसलिए यह अत्यधिक नहीं है।

इन टिप्पणियों के साथ, हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी और संबंधित रिकॉर्ड को सजा के निष्पादन के लिए ट्रायल कोर्ट वापस भेजने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: निक्का राम बनाम पदम नाथ (दिवंगत) उनके कानूनी वारिसों के माध्यम से और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल रिविजन नंबर 34 ऑफ 2024
  • बेंच: जस्टिस राकेश कैंथला
  • निर्णय की तिथि: 05 मार्च, 2026

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