इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चोरी और आपराधिक विश्वासघात के आरोपों में एक महिला और चार अन्य के खिलाफ जारी समन आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी अपने ‘स्त्रीधन’ की पूर्ण स्वामी है और उस पर पति या ससुराल वालों का कोई नियंत्रण नहीं होता।
न्यायमूर्ति चवन प्रकाश की एकल पीठ ने धारा 482 Cr.P.C. के तहत दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए, एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट-द्वितीय, कानपुर नगर की अदालत में लंबित शिकायत वाद संख्या 8240/2018 की कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक संख्या 1 और विपक्षी संख्या 2 का विवाह 19 अप्रैल 2012 को हुआ था। आवेदकों के अनुसार, विवाह में पर्याप्त दहेज दिया गया था, लेकिन पति और उसके परिवार वाले इससे संतुष्ट नहीं थे और पत्नी को प्रताड़ित करने लगे।
सितंबर 2018 में, पत्नी ने पति और उसके परिवार के खिलाफ धारा 498-A, 323 IPC और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत प्राथमिकी (केस क्राइम नंबर 53/2018) दर्ज कराई। इसके बाद, उसने धारा 125 Cr.P.C. के तहत भरण-पोषण का आवेदन किया, जिसे अदालत ने मई 2022 में स्वीकार करते हुए पति को पत्नी के लिए ₹4,000 और पुत्र के लिए ₹1,000 प्रति माह भुगतान करने का निर्देश दिया।
पति ने इसे “काउंटरब्लास्ट” (जवाबी कार्रवाई) बताते हुए एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि 29 सितंबर 2018 को पत्नी ने अन्य परिजनों के साथ उसके घर में घुसकर ₹6,400 नकद, लगभग ₹1,50,000 के आभूषण और घरेलू सामान ले लिया। इस आधार पर मजिस्ट्रेट ने आवेदकों को धारा 323, 504 और 406 IPC के तहत समन जारी किया था।
पक्षों के तर्क
आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि पत्नी अपने स्त्रीधन की पूर्ण मालिक है और जो घरेलू सामान ले जाने का आरोप है, वह संयुक्त रूप से उपयोग किया जाता था। उन्होंने आगे तर्क दिया कि मजिस्ट्रेट ने न्यायिक दिमाग का उपयोग किए बिना “यांत्रिक तरीके” से समन आदेश पारित किया।
दूसरी ओर, पति के वकील ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट का आदेश तर्कसंगत था और धारा 200 और 202 Cr.P.C. के तहत दर्ज बयानों सहित उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित था। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्नी वास्तव में पति के घर से नकदी और कीमती सामान ले गई थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने धारा 405 IPC के तहत ‘आपराधिक विश्वासघात’ की परिभाषा और धारा 406 IPC के तहत इसके दंड का परीक्षण किया। हाईकोर्ट ने गौर किया कि यह अपराध तभी बनता है जब संपत्ति किसी को सौंपी (entrust) गई हो और उस व्यक्ति ने उसका बेईमानी से दुरुपयोग किया हो।
वैवाहिक संपत्ति के स्वामित्व के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा:
“यह कानून का सुस्थापित सिद्धांत है कि विवाह से पहले, विवाह के समय या उसके बाद महिला को दी गई संपत्ति उसकी ‘स्त्रीधन’ संपत्ति होती है। यह उसकी पूर्ण संपत्ति है और उसे अपनी इच्छानुसार निपटाने का उसे पूरा अधिकार है। पति या अन्य ससुराल वालों का उसकी ‘स्त्रीधन’ संपत्ति पर कोई नियंत्रण नहीं होता है।”
हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“‘स्त्रीधन’ संपत्ति पत्नी और पति की संयुक्त संपत्ति नहीं बन जाती है। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि पत्नी ‘स्त्रीधन’ संपत्ति की पूर्ण स्वामी है।”
हाईकोर्ट ने पाया कि धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना) और 504 (अपमान) के तहत शेष आरोप “सामान्य प्रकृति” के थे। अदालत ने पाया कि मजिस्ट्रेट IPC में दी गई कानूनी परिभाषाओं पर विचार करने में विफल रहे और “बहुत ही लापरवाही भरे तरीके” से आदेश पारित किया।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी के खिलाफ धारा 406 IPC के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। समन आदेश को मामले के तथ्यों के विपरीत पाते हुए, हाईकोर्ट ने आवेदन को स्वीकार कर लिया।
“17.11.2022 का समन आदेश… रद्द किया जाता है और उक्त मामले की पूरी कार्यवाही एतद्द्वारा निरस्त की जाती है।”
केस विवरण:
- केस टाइटल: अनामिका तिवारी और 4 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: APPLICATION U/S 482 No. 37453 of 2024
- पीठ: न्यायमूर्ति चवन प्रकाश
- दिनांक: 16 मार्च, 2026

