सिविल जज को मुस्लिम विवाह विच्छेद का अधिकार नहीं; फैमिली कोर्ट की अनुपस्थिति में जिला न्यायालय ही सक्षम: गुवाहाटी हाईकोर्ट

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक नियमित द्वितीय अपील (Regular Second Appeal) को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पास विवाह विच्छेद (तलाक) की डिक्री पारित करने या विवाह को भंग करने का क्षेत्राधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जिन जिलों में फैमिली कोर्ट स्थापित नहीं है, वहां केवल जिला जज या मूल क्षेत्राधिकार वाला प्रधान सिविल न्यायालय (Principal Civil Court) ही ऐसे वैवाहिक मामलों में निर्णय लेने के लिए सक्षम प्राधिकारी है।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता (पति) ने मूल रूप से सिविल जज (जूनियर डिवीजन), हाईलाकांडी के समक्ष वैवाहिक (डी) वाद (संख्या 18/2024) दायर किया था। इस वाद में, उसने 25 जुलाई, 2021 को “तलाक के रूप में” अपनी शादी के विघटन की घोषणा की प्रार्थना की थी और साथ ही 12 नवंबर 2023, 17 दिसंबर 2023 और 30 जनवरी 2024 को उसके द्वारा निष्पादित लिखित तलाक की पुष्टि मांगी थी।

प्रतिवादी (पत्नी) के उपस्थित न होने के कारण सिविल जज (जूनियर डिवीजन), हाईलाकांडी ने मामले की एकतरफा (ex-parte) सुनवाई की। 15 मई, 2025 को ट्रायल कोर्ट ने एक निर्णय पारित किया जिसमें यह डिक्री दी गई कि “पक्षकारों के बीच विवाह ‘तलाक’ के रूप में भंग हो गया है” और अपीलकर्ता द्वारा निष्पादित लिखित तलाक की पुष्टि की गई।

इस डिक्री से व्यथित होकर, प्रतिवादी पत्नी ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन), हाईलाकांडी के समक्ष अपील (टी.ए. संख्या 09/2025) दायर की। 25 जून, 2025 को अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले और डिक्री को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पास ऐसे मामले पर विचार करने का क्षेत्राधिकार नहीं था और इसे शून्य (nullity) घोषित कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील, एम.जे. कादिर ने तर्क दिया कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के समक्ष दायर वाद हिंदू विवाह अधिनियम या विशेष विवाह अधिनियम के तहत तलाक की याचिका नहीं थी, बल्कि यह विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act), 1963 की धारा 34 के तहत कानूनी चरित्र (legal character) की घोषणा के लिए एक वाद था। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्ता ने केवल यह घोषणा मांगी थी कि उसके द्वारा दिया गया तलाक वैध है।

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वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले समर कुमार रॉय बनाम झरना बेरा (2017) और गुवाहाटी हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ के फैसले टीका राम नेपाल बनाम अंबिका देवी का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जब मांगी गई राहत विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम के अंतर्गत आती है, तो सिविल अदालतों को विवाह के कानूनी चरित्र को निर्धारित करने से नहीं रोका जा सकता है।

इसके विपरीत, प्रतिवादी पत्नी के वकील एन. हक ने दलील दी कि भले ही इसे घोषणात्मक वाद कहा गया हो, लेकिन अपीलकर्ता प्रभावी रूप से तलाक की डिक्री मांग रहा था। उन्होंने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 8 के तहत अधीनस्थ अदालतों का क्षेत्राधिकार वर्जित है। उन्होंने जोर देकर कहा कि फैमिली कोर्ट की अनुपस्थिति में, केवल जिला जज के पास विवाह के विघटन की कार्यवाही पर विचार करने का अधिकार है।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

अपील की सुनवाई कर रहीं जस्टिस मिताली ठाकुरिया ने कानून का सारभूत प्रश्न (substantial question of law) तय किया कि क्या निचली अपीलीय अदालत ने क्षेत्राधिकार के आधार पर ट्रायल कोर्ट की डिक्री को रद्द करके सही किया है।

कोर्ट ने पाया कि हालांकि अपीलकर्ता ने दावा किया कि वाद केवल तलाक की वैधता की घोषणा के लिए था, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने विशेष रूप से यह डिक्री दी थी कि “पक्षकारों के बीच विवाह भंग हो गया है।” जस्टिस ठाकुरिया ने कहा:

“इस प्रकार यह देखा गया है कि वैध तलाक की घोषणा की आड़ में, विद्वान सिविल जज (जूनियर डिवीजन), हाईलाकांडी ने अपीलकर्ता पति द्वारा प्रतिवादी पत्नी को दिए गए तलाक को प्रमाणित कर दिया था। यह विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 34 के तहत किसी कानूनी चरित्र के लिए मांगी गई साधारण घोषणा का मामला नहीं है… बल्कि वादी तलाक/विवाह विच्छेद की डिक्री मांग रहा है… जिसे विद्वान सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत द्वारा प्रमाणित किया गया है।”

हाईकोर्ट ने वैवाहिक क्षेत्राधिकार के संबंध में स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया:

“यह एक स्थापित कानून है कि पारिवारिक विवाद, विवाह का विघटन, हिंदू विवाह अधिनियम या विशेष विवाह अधिनियम के तहत तलाक की डिक्री केवल फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7 और 8 के तहत फैमिली कोर्ट द्वारा ही विचारणीय है और फैमिली कोर्ट की अनुपस्थिति में, जिला न्यायालय मामलों की जांच कर सकता है।”

हाईकोर्ट ने निचली अपीलीय अदालत के इस निष्कर्ष से सहमति व्यक्त की कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) न तो फैमिली कोर्ट और न ही जिला न्यायालय के समकक्ष क्षेत्राधिकार, क्षमता या अधिकार रखते हैं जो ऐसे मामलों से निपट सकें।

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निर्णय

हाईकोर्ट ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के फैसले को बरकरार रखा और फैसला सुनाया कि क्षेत्राधिकार की कमी के कारण सिविल जज (जूनियर डिवीजन) द्वारा पारित डिक्री शून्य (nullity) थी। कोर्ट ने अपीलीय अदालत के उस निर्देश की पुष्टि की जिसमें पक्षकारों को उचित मंच (appropriate forum) से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी गई थी।

कोर्ट ने कहा:

“लेकिन विद्वान सिविल जज (जूनियर डिवीजन), हाईलाकांडी के पास तलाक/विवाह विच्छेद की कोई भी डिक्री पारित करने का ऐसा कोई अधिकार या शक्ति नहीं थी।”

नतीजतन, नियमित द्वितीय अपील को योग्यता से रहित (devoid of merit) मानते हुए खारिज कर दिया गया।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: जावेद परवेज चौधरी बनाम बेगम नजीफा यास्मीन चौधरी
  • केस नंबर: RSA/131/2025
  • जज: जस्टिस मिताली ठाकुरिया
  • फैसले की तारीख: 08 जनवरी, 2026

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