मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत ‘क्रूरता’ की श्रेणी में आता है, लेकिन इसे धारा 376 के तहत बलात्कार या धारा 377 के तहत अप्राकृतिक अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने IPC की धारा 375 में दिए गए ‘वैवाहिक अपवाद’ (Marital Exception) और धारा 375 व 377 के बीच विरोधाभास का हवाला देते हुए यह निर्णय सुनाया। इसके साथ ही कोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज धारा 376(2)(n) और 377 की FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया, जबकि क्रूरता और मारपीट के आरोपों को बरकरार रखा है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी क्रमांक 2 (पत्नी) का विवाह 26 जून 2022 को हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शादी के कुछ दिनों बाद ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गए। आरोप है कि 1 मार्च 2023 को इंदौर यात्रा के दौरान पति ने विवाद के बाद पत्नी के साथ मारपीट की और उसका सिर दीवार पर दे मारा। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति “जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाता था और उसकी इच्छा के विरुद्ध कई बार अप्राकृतिक कृत्य भी किए।”
28 अगस्त 2023 को हुई एक अन्य घटना के बाद, जिसमें पत्नी के साथ गाली-गलौज और मारपीट का आरोप था, पत्नी ने 1 अक्टूबर 2023 को मुरैना जिले के कोतवाली थाने में FIR दर्ज कराई। पुलिस ने पति के खिलाफ IPC की धारा 498A (क्रूरता), 376(2)(n) (बार-बार बलात्कार), 377 (अप्राकृतिक अपराध), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 294 (अश्लील कृत्य) के तहत मामला दर्ज किया। 25 नवंबर 2023 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), मुरैना ने इन अपराधों पर संज्ञान लिया। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में धारा 482 के तहत याचिका दायर की।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यह FIR पति द्वारा 6 सितंबर 2023 को दायर की गई तलाक की याचिका के जवाब में “काउंटरब्लास्ट” (बदले की कार्रवाई) के रूप में दर्ज कराई गई है। उन्होंने कहा कि पत्नी ने तलाक के नोटिस को स्वीकार करने से इनकार करने के बाद ही यह FIR दर्ज कराई।
कानूनी वैधता पर तर्क देते हुए, पति पक्ष ने कहा कि IPC की धारा 375 के अपवाद 2 के तहत, एक पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ किए गए यौन कृत्य बलात्कार की श्रेणी में नहीं आते। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के नवतेज सिंह जौहर मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि सहमति से किए गए कार्यों में धारा 377 लागू नहीं होती। चूंकि धारा 375 में वैवाहिक अपवाद मौजूद है, इसलिए पति-पत्नी के बीच अप्राकृतिक अपराध का मामला नहीं बनता। वकील ने यह भी बताया कि मेडिकल रिपोर्ट में अप्राकृतिक यौन संबंध के कोई सबूत नहीं मिले हैं और डॉक्टर ने इस पर कोई निश्चित राय नहीं दी है।
वहीं, राज्य और प्रतिवादी पत्नी के वकीलों ने याचिका का विरोध किया और इसे खारिज करने की मांग की।
कोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता ने विवाह के संदर्भ में धारा 375 और धारा 377 के बीच के संबंधों का विश्लेषण किया।
वैवाहिक बलात्कार (धारा 376 IPC) पर: कोर्ट ने IPC की धारा 375 के अपवाद 2 का उल्लेख किया, जो यह प्रावधान करता है कि यदि पत्नी की उम्र 15 वर्ष (न्यायिक निर्णयों के अनुसार 18 वर्ष) से कम नहीं है, तो पति द्वारा उसके साथ किया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले कुलदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य (2025 INSC 130) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“अपनी ही पत्नी के साथ यौन संबंध, जहां पत्नी बालिग है और कोई बल प्रयोग नहीं किया गया है, धारा 375 IPC के अपवाद 2 के अंतर्गत आता है; इसलिए, धारा 376 IPC के तहत आरोप नहीं लगाया जा सकता।”
अप्राकृतिक अपराध (धारा 377 IPC) पर: कोर्ट ने इस बात की जांच की कि क्या पति पर पत्नी के साथ किए गए कृत्यों के लिए धारा 377 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। कोर्ट ने धारा 375 की संशोधित परिभाषा और धारा 377 के बीच “विरोधाभास” (Repugnancy) को रेखांकित किया।
“पति और पत्नी के बीच का अपराध धारा 375 के तहत संशोधन के कारण नहीं बनता है और ऐसी स्थिति में विरोधाभास है कि जब धारा 375 के तहत सब कुछ निरस्त कर दिया गया है, तो पति और पत्नी के बीच धारा 377 का अपराध कैसे आकर्षित होगा।”
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया:
“लेकिन, इस कोर्ट की यह भी राय है कि पति द्वारा पत्नी पर जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना धारा 498A IPC के तहत क्रूरता की श्रेणी में आता है, लेकिन इसे धारा 376 IPC के तहत बलात्कार के रूप में अभियोजित नहीं किया जा सकता क्योंकि धारा 375 में स्पष्ट वैवाहिक अपवाद के कारण मौजूदा कानून में वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को मान्यता नहीं दी गई है।”
दुर्भावनापूर्ण अभियोजन पर: भजन लाल मामले के दिशानिर्देशों को लागू करते हुए, कोर्ट ने पाया कि धारा 377 का ट्रायल केवल मौखिक बयानों पर शुरू हुआ था और मेडिकल रिपोर्ट में अप्राकृतिक यौन संबंध के कोई चोट के निशान नहीं मिले थे। कोर्ट ने माना कि FIR तलाक के मामले के जवाब में दर्ज कराई गई प्रतीत होती है।
फैसला
हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया। कोर्ट ने IPC की धारा 376(2)(n) और 377 के तहत दर्ज FIR और संबंधित कार्यवाही को रद्द कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने IPC की धारा 498A, 323 और 294 के तहत कार्यवाही को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने इन अपराधों के संबंध में अपना मामला स्थापित किया है और इसकी वैधता ट्रायल के दौरान साबित की जानी चाहिए।

