उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन नियोक्ता की जानकारी और अनुमति से किया गया हो, तो दुर्घटना की स्थिति में बीमा कंपनी को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे मामलों में मुआवजा देने की जिम्मेदारी नियोक्ता पर ही होगी।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित ने बीमा कंपनी को राहत देते हुए मृतक चालक के परिवार को 17 वर्ष बाद मुआवजा दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया।
मामला कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत दायर एक याचिका से संबंधित था, जिसे भक्ति राम ने अपने 22 वर्षीय पुत्र मनीष कुमार की मृत्यु के बाद दायर किया था। मनीष देवभूमि कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड में ट्रक चालक के रूप में कार्यरत था।
20 मार्च 2009 की रात ऋषिकेश–श्रीनगर मार्ग पर ट्रक गहरी खाई में गिर गया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। परिवार ने यह कहते हुए मुआवजा मांगा कि वे मृतक पर आर्थिक रूप से निर्भर थे।
वाहन स्वामी कंपनी ने माना कि दुर्घटना ड्यूटी के दौरान हुई, लेकिन कहा कि वाहन बीमित होने के कारण भुगतान की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की है।
बीमा कंपनी ने दलील दी कि मृतक के पास भारी वाहन चलाने का वैध लाइसेंस नहीं था। जांच में पाया गया कि उसके पास केवल लाइट मोटर व्हीकल का लाइसेंस था और उसे ट्रक चलाने देना नियोक्ता की लापरवाही थी।
इसी आधार पर आयुक्त ने बीमा कंपनी को दायित्व से मुक्त करते हुए पूरा मुआवजा वाहन स्वामी पर डाल दिया।
हाईकोर्ट ने आयुक्त के निष्कर्षों को विधिसम्मत मानते हुए कहा कि जब बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन नियोक्ता की जानकारी या अनुमति से किया जाता है, तो बीमाकर्ता को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में नियोक्ता बीमा कंपनी पर दायित्व नहीं डाल सकता।
अदालत ने मुआवजे की गणना को सही ठहराया और उसमें हस्तक्षेप करने से इंकार किया।
मूल मुआवजा ₹4,48,000 तय किया गया था। इस पर दो वर्ष नौ माह के लिए आठ प्रतिशत साधारण ब्याज जोड़कर कुल राशि ₹5,46,560 हुई।
अदालत ने निर्देश दिया कि पूर्व में किए गए किसी भुगतान का समायोजन करने के बाद पूरी राशि सहित ब्याज तत्काल याचिकाकर्ता भक्ति राम को दी जाए।

