डीएनए से सिर्फ पितृत्व साबित होता है, बलात्कार में सहमति की गैर-मौजूदगी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि डीएनए सबूत जो किसी व्यक्ति के पितृत्व की पुष्टि करता है, वह अपने आप में बलात्कार का अपराध सिद्ध नहीं कर सकता जब तक कि स्वतंत्र साक्ष्य यह न दर्शाएं कि यौन संबंध बिना सहमति के थे।

न्यायमूर्ति अमित महाजन की एकल पीठ ने CRL.A. 242/2023, नथू बनाम राज्य मामले में यह निर्णय सुनाया, जो सेशंस केस संख्या 216/2018 (एफआईआर संख्या 30/2018, थाना नांगलोई) से संबंधित था। अदालत ने एक युवक को नाबालिग युवती से कई महीनों तक बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि “केवल यौन संबंध और उससे गर्भवती होने का तथ्य बलात्कार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है जब तक यह न दिखाया जाए कि वह यौन क्रिया उसकी सहमति के बिना हुई थी।”

मामले की पृष्ठभूमि:

यह मामला एक युवती की शिकायत पर आधारित था, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि उसके पड़ोसी नथू ने वर्ष 2017 में लगभग छह महीनों तक उसके साथ बार-बार बलात्कार किया। पीड़िता ने कहा कि यह घटनाएं नथू के घर पर ‘लूडो’ खेलने के बहाने होती थीं। शिकायत 2018 की शुरुआत में गर्भवती होने का पता चलने के बाद दर्ज कराई गई।

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नथू को 13 फरवरी 2018 को गिरफ्तार किया गया और उसके खिलाफ IPC की धारा 376(2)(n) (बार-बार बलात्कार) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत आरोप तय किए गए। ट्रायल कोर्ट (FTSC, तीस हजारी) ने मुख्य रूप से पीड़िता और उसके परिवार की गवाही व डीएनए रिपोर्ट (जो यह साबित करती थी कि बच्चा आरोपी का है) के आधार पर नथू को दोषी ठहराया।

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प्रमुख कानूनी मुद्दे और तर्क:

अपीलकर्ता के वकील सुनीता अरोड़ा ने दलील दी कि:

  • दोनों के बीच संबंध सहमति से थे।
  • एफआईआर दर्ज कराने में काफी देरी हुई और गवाही में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
  • मेडिकल जांच में कहीं भी बल प्रयोग या जबरदस्ती के कोई निशान नहीं मिले।
  • शुरूआती शिकायत में धमकी (धारा 506 IPC) का कोई उल्लेख नहीं था – यह आरोप बाद में गवाही के दौरान जोड़ा गया।
  • डीएनए रिपोर्ट केवल पितृत्व की पुष्टि करती है, बलात्कार में सहमति न होने की नहीं।

राज्य पक्ष की ओर से APP सुनील कुमार गौतम, अस्था और मेघा सिंह (डीएचसीएलएससी द्वारा नियुक्त) ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया और कहा कि:

  • पीड़िता का आरोप निराधार नहीं था।
  • उसकी गवाही सुसंगत और स्पष्ट थी।
  • उसे झूठा फंसाने का कोई कारण नहीं था।
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डीएनए: एक दोधारी तलवार

अदालत ने माना कि डीएनए रिपोर्ट (प्रमाण PW9/A) यह सिद्ध करती है कि आरोपी ही बच्चे का जैविक पिता है, लेकिन यह तथ्य बलात्कार का अपराध सिद्ध करने के लिए अपर्याप्त है जब तक सहमति की गैर-मौजूदगी के स्वतंत्र साक्ष्य न हों।

न्यायमूर्ति महाजन ने कहा:

“डीएनए रिपोर्ट सिर्फ पितृत्व सिद्ध करती है — यह स्वयं में सहमति की गैर-मौजूदगी को सिद्ध नहीं कर सकती। यह स्थापित कानून है कि धारा 376 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए ‘सहमति की अनुपस्थिति’ आवश्यक है।”

कोर्ट के अवलोकन:

18 पृष्ठों के फैसले में कोर्ट ने निम्न बातों का विश्लेषण किया:

  • एफआईआर दर्ज करने में लगभग 2-3 महीने की देरी।
  • पीड़िता की गवाही में विरोधाभास, जैसे कि धारा 164 CrPC के तहत दिए गए बयान में धमकी का उल्लेख नहीं होना।
  • आरोपी के घर में स्वेच्छा से आना-जाना और आरोपी के प्रति प्रेम-भावना की स्वीकारोक्ति।
  • यह संभावना कि संबंध सहमति से थे और गर्भावस्था के बाद सामाजिक दबाव में शिकायत दर्ज कराई गई।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय Sadashiv Ramrao Hadbe बनाम महाराष्ट्र राज्य को उद्धृत करते हुए कहा:

“यदि पीड़िता की बातों का कोई चिकित्सकीय समर्थन नहीं है या परिस्थितियां अत्यंत अविश्वसनीय हैं… तो अदालत को केवल पीड़िता की अकेली गवाही पर भरोसा नहीं करना चाहिए।”

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धारा 506 IPC के तहत दोषसिद्धि भी रद्द

कोर्ट ने पाया कि धमकी देने का कोई समकालीन प्रमाण नहीं था। शुरूआती बयानों में धमकी का कोई उल्लेख नहीं था और यह बात पहली बार ट्रायल के दौरान जोड़ी गई, जो आरोप की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न करती है।

न्यायमूर्ति महाजन ने कहा कि यह एक “गंभीर परिवर्तन” था, जिससे आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है।

अंतिम निर्णय:

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका और ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की कमियों और विरोधाभासों को नजरअंदाज करके दोषसिद्धि दी।

अतः कोर्ट ने कहा:

“संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए – और दिया जाता है।”

इस आधार पर ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया गया और आरोपी नथू को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

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