इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति के जेंडर परिवर्तन के लिए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की धारा 7 के तहत जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी प्रमाणपत्र ही अंतिम और निर्णायक प्रमाण होगा, और पासपोर्ट प्राधिकरण इससे अतिरिक्त किसी नए मेडिकल परीक्षण या अन्य दस्तावेज की मांग नहीं कर सकता।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने 10 फरवरी को खुश आर गोयल द्वारा दायर याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता ने 23 जून 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें पासपोर्ट प्राधिकरण ने जेंडर परिवर्तन के लिए उन्हें अपने पैनल के अस्पताल में दोबारा मेडिकल जांच कराने को कहा था।
याचिकाकर्ता का जन्म महिला के रूप में हुआ था, लेकिन बाद में उन्होंने स्वयं को ट्रांसजेंडर के रूप में पहचाना। वयस्क होने के बाद उन्होंने जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी कराई और पुरुष के रूप में ट्रांजिशन किया। इसके बाद उन्होंने जिला मजिस्ट्रेट से 2019 के अधिनियम के तहत प्रमाणपत्र प्राप्त किया, जो सभी सरकारी दस्तावेजों में नाम और जेंडर परिवर्तन का अधिकार देता है।
इसके बावजूद पासपोर्ट में जेंडर संशोधन के आवेदन पर प्राधिकरण ने दोबारा मेडिकल परीक्षण की शर्त लगा दी।
अदालत ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट के प्रमाणपत्र की धारा 5 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि धारक अपने सभी आधिकारिक दस्तावेजों में नाम और जेंडर बदल सकता है। इसलिए पासपोर्ट प्राधिकरण द्वारा अतिरिक्त मेडिकल जांच या जन्म प्रमाणपत्र में संशोधन की मांग करना विधिसम्मत नहीं है।
खंडपीठ ने कहा कि पासपोर्ट प्राधिकरण “नए मेडिकल परीक्षण पर जोर नहीं दे सकता” और न ही अन्य दस्तावेजों की मांग कर सकता है।
अदालत ने अधिनियम के उद्देश्य पर जोर देते हुए कहा कि यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक बहिष्कार से बचाने और उन्हें गरिमा व समान अधिकार प्रदान करने के लिए बनाया गया है, ताकि वे अपनी स्वाभाविक पहचान को दबाने के लिए मजबूर न हों।
जिला मजिस्ट्रेट के प्रमाणपत्र को विवाद का “पूर्ण समाधान” मानते हुए अदालत ने अतिरिक्त मेडिकल जांच की शर्त को रद्द कर दिया और याचिका का निस्तारण कर दिया।

