धारा 161 के बयान में आरोपी की भूमिका का जिक्र न होना ‘घातक’: सुप्रीम कोर्ट ने दोहरे हत्याकांड के आरोपी को बरी किया

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जसविंदर सिंह उर्फ शिंदर सिंह को बरी कर दिया और 1999 के दोहरे हत्याकांड (Double Murder) मामले में उसकी सजा को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने माना कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पहली बार दिए गए अस्पष्ट बयानों के अलावा अपीलकर्ता के खिलाफ “बिल्कुल भी कोई आपत्तिजनक परिस्थितियां” (absolutely no incriminating circumstances) नहीं थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य के खिलाफ जसविंदर सिंह उर्फ शिंदर सिंह द्वारा दायर आपराधिक अपील को स्वीकार कर लिया। अपीलकर्ता को उस वाहन का चालक होने के आरोप में दोषी ठहराया गया था, जिसका उपयोग हमलावरों ने 14 अक्टूबर 1999 को दो भाइयों, शिंगारा सिंह और बलकार सिंह की हत्या करने के लिए किया था।

अदालत ने पाया कि रिमांड के बाद हाई कोर्ट द्वारा दी गई सजा उन सबूतों पर आधारित थी जिनमें ‘घातक चूक’ (fatal omissions) थीं और जिनका कोई पुष्टिकरण (corroboration) नहीं था। फैसला लिखते हुए, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष “मुख्य अपराध” (crime proper) में अपीलकर्ता की संलिप्तता स्थापित करने में विफल रहा। नतीजतन, कोर्ट ने सजा के फैसले को रद्द कर दिया और अपीलकर्ता की तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि (Background of the Case)

घटना 14 अक्टूबर 1999 की शाम को हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, हमलावर ग्राम पूनिया के बस स्टैंड के पास नीले रंग की टाटा मोबाइल 207 में पहुंचे। दो आरोपियों, सुखदेव सिंह उर्फ देबा और ढलविंदर सिंह उर्फ भिंडर ने कथित तौर पर .315 बोर की राइफल से शिंगारा सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी।

अभियोजन पक्ष का दावा था कि जसविंदर सिंह उर्फ शिंदर सिंह गाड़ी चला रहा था। पहली गोलीबारी के बाद, पीड़ित के पिता (PW-7) अपने परिवार को सूचित करने के लिए घर पहुंचे। वहां पहुंचने पर, उन्होंने पाया कि उनके दूसरे बेटे, बलकार सिंह की भी उसी दिन उन्ही आरोपियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी, जब वह अपने स्कूटर पर घर लौट रहा था।

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पुलिस रिपोर्ट में शुरू में अपीलकर्ता को आरोपी के रूप में शामिल नहीं किया गया था, लेकिन बाद में 24 अगस्त 2000 को ट्रायल कोर्ट द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (Cr.P.C.) की धारा 319 के तहत उसे समन किया गया था।

इस मामले का कानूनी सफर जटिल था। ट्रायल कोर्ट ने शुरू में आरोपियों को दोषी ठहराया था, लेकिन हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और उन्हें बरी कर दिया। बाद में, मामले को वापस (remand) भेजा गया, जिसके बाद सजा की पुष्टि करने वाला फैसला आया, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान अपील की गई थी।

दलीलें और सबूत (Arguments and Evidence)

सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के दो प्रमुख गवाहों: PW-7 (मृतक के पिता) और PW-10 (मृतक भाइयों में से एक की पत्नी) की गवाही की जांच की।

PW-7 की गवाही PW-7 ने अन्य दो आरोपियों की पहचान गोली चलाने वालों के रूप में की। अपीलकर्ता के संबंध में, PW-7 ने अदालत में गवाही दी कि जसविंदर सिंह ने वाहन चलाया था और “अन्य दो लोगों द्वारा गोली मारे जाने से पहले बेटे को घसीटा था।”

हालांकि, जिरह (cross-examination) के दौरान, बचाव पक्ष ने PW-7 का सामना Cr.P.C. की धारा 161 के तहत दर्ज उनके पहले के बयान से कराया। कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विसंगति नोट की: पुलिस बयान में अपीलकर्ता के वाहन से उतरने या पीड़ित को घसीटने का कोई उल्लेख नहीं था।

PW-10 की गवाही PW-10, जिसे दूसरी हत्या के प्रत्यक्षदर्शी (eyewitness) के रूप में प्रस्तुत किया गया था, ने कटघरे में अपीलकर्ता की पहचान की और कहा कि वह वाहन चला रहा था। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि “शुरुआत में पुलिस द्वारा उक्त गवाह का कोई बयान दर्ज नहीं किया गया था,” बावजूद इसके कि वह पंचनामा (inquest) के दौरान घटनास्थल पर मौजूद थी।

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बचाव पक्ष की दलीलें (Defense Arguments) बचाव पक्ष ने DW-1, पुलिस उपाधीक्षक (DSP) को पेश किया जिन्होंने प्रारंभिक जांच की थी। DW-1 ने गवाही दी कि PW-7 और PW-10 दोनों ने समन किए जाने के बावजूद जांच में सहयोग नहीं किया। उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने एक रिपोर्ट दाखिल की थी जिसमें अपीलकर्ता को निर्दोष पाया गया था।

इसके अतिरिक्त, टाटा मोबाइल के पंजीकृत मालिक के पिता (DW-2) ने गवाही दी कि वाहन का कब्जा उनके पास था और उन्होंने “किसी भी आरोपी को वाहन नहीं सौंपा था।”

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ (Court’s Analysis and Observations)

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता के खिलाफ सबूतों की बारीकी से जांच की और स्थिरता व पुष्टिकरण की कमी पर जोर दिया।

PW-7 द्वारा की गई चूक पर: पीठ ने अपीलकर्ता के कृत्य के बारे में PW-7 के पुलिस बयान में हुई चूक को महत्वपूर्ण करार दिया। फैसले में कहा गया:

“यह चूक घातक (fatal) है जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि अपीलकर्ता को पहले चरण में आरोपी नहीं बनाया गया था और उसे ट्रायल कोर्ट के 24.08.2000 के आदेश द्वारा Cr.P.C. की धारा 319 के तहत तलब किया गया था।”

वाहन और बरामदगी पर: कोर्ट ने नोट किया कि हालांकि घटना के अगले दिन टाटा मोबाइल जब्त कर ली गई थी, लेकिन जब्ती के गवाह (PW-9) ने केवल अन्य आरोपियों के वाहन में होने की बात कही, अपीलकर्ता की नहीं। कोर्ट ने देखा:

“वाहन में अपीलकर्ता के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला और वाहन को कोर्ट के सामने पेश भी नहीं किया गया या प्रत्यक्षदर्शियों से उसकी पहचान नहीं कराई गई।”

इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि “वाहन के मालिक और अपीलकर्ता के बीच कोई संबंध स्थापित नहीं हुआ है।”

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मकसद और रंजिश पर: फैसले में आरोपी और पीड़ितों के परिवारों के बीच “दुश्मनी के इतिहास” (history of animosity) पर प्रकाश डाला गया, जिसमें अवैध गतिविधियां और नशीले पदार्थों के मामले शामिल थे। कोर्ट ने नोट किया कि “एक-दूसरे के खिलाफ प्रतिशोधपूर्ण कार्रवाई की गई, जिसके परिणामस्वरूप दोनों गिरोहों के सदस्यों की मौत हुई है।”

फैसला (Decision)

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे (beyond reasonable doubt) अपीलकर्ता का दोष साबित करने में विफल रहा। पीठ ने कहा:

“समग्र परिदृश्य पर, हम अपीलकर्ता को बरी करने के लिए इच्छुक हैं क्योंकि उसके खिलाफ कोई आपत्तिजनक परिस्थिति नहीं मिली है, सिवाय वाहन चलाने के एक अस्पष्ट बयान के और मुख्य अपराध में उसकी संलिप्तता का पुलिस को दिए बयान में जिक्र नहीं था और पहली बार कोर्ट के सामने बताया गया।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका निर्णय सख्ती से केवल जसविंदर सिंह उर्फ शिंदर सिंह के खिलाफ सबूतों की कमी से संबंधित है और अन्य आरोपियों के सबूतों पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है।

परिणाम (Outcome):

  • आपराधिक अपील स्वीकार की गई।
  • हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसले को अपीलकर्ता के संबंध में रद्द कर दिया गया।
  • अपीलकर्ता को कथित अपराध से बरी कर दिया गया।
  • कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि अपीलकर्ता हिरासत में है, तो उसे “तुरंत रिहा किया जाए,” और यदि जमानत पर है, तो “जमानत बांड रद्द कर दिए जाएं।”

केस विवरण (Case Details):

  • केस का नाम: जसविंदर सिंह @ शिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य
  • केस संख्या: Criminal Appeal No. of 2026 (@Special Leave Petition (Crl.) No. of 2026; Diary No. 46882 of 2024)
  • पीठ: न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन

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