सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल विभागीय जांच (Departmental Enquiry) में आरोप मुक्त होने से उसी मामले में चल रहा आपराधिक मुकदमा अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। कोर्ट ने कहा कि यह नियम विशेष रूप से तब लागू होता है जब दोनों कार्यवाहियां अलग-अलग संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही हों और दोषमुक्ति आरोपों के गुण-दोष (Merits) के बजाय तकनीकी आधार पर हुई हो।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कर्नाटक लोकायुक्त द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक एग्जीक्यूटिव इंजीनियर के खिलाफ भ्रष्टाचार के आपराधिक मुकदमे को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया गया था क्योंकि उसे विभागीय जांच में निर्दोष करार दिया गया था।
मामला क्या था?
यह मामला कर्नाटक के बागलकोट में HESCOM के वर्क्स एंड मेंटेनेंस डिवीजन में तैनात एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल), चंद्रशेखर से जुड़ा है। प्रतिवादी (चंद्रशेखर) पर आरोप था कि उसने एक इलेक्ट्रिकल कॉन्ट्रैक्टर से पांच बिल पास करने के एवज में 2,000 रुपये प्रति बिल के हिसाब से कुल 10,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी।
कॉन्ट्रैक्टर की शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने जाल बिछाया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह ट्रैप सफल रहा था। आरोपी की जेब से पाउडर लगे नोट बरामद हुए थे और जब उसके हाथ एक रासायनिक घोल में डुबोए गए, तो उनका रंग गुलाबी हो गया, जो रिश्वत के पैसों के संपर्क में आने का प्रमाण था।
इसके बाद आरोपी के खिलाफ दो समानांतर कार्यवाहियां शुरू हुईं:
- विभागीय जांच: जो विभाग (HESCOM) द्वारा की गई।
- आपराधिक अभियोजन: जो लोकायुक्त (अपीलकर्ता) द्वारा शुरू किया गया।
विभागीय जांच में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया। इसी आधार पर आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने राधेश्याम केजरीवाल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2011) के फैसले का हवाला देते हुए आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का तर्क था कि जब आरोपों को ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (Preponderance of Probabilities) के निचले मानक पर भी साबित नहीं किया जा सका, तो उन्हें ‘उचित संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित करना असंभव होगा।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को खारिज करते हुए मामले की बारीकियों पर गौर किया।
‘राधेश्याम केजरीवाल’ का फैसला यहाँ लागू नहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राधेश्याम केजरीवाल मामले के तथ्य वर्तमान मामले से भिन्न थे। उस मामले में एडजुडिकेशन और आपराधिक कार्यवाही दोनों एक ही संस्था (प्रवर्तन निदेशालय – ED) द्वारा की गई थीं और वहां आरोपों को गुण-दोष के आधार पर पूरी तरह खारिज किया गया था।
इसके विपरीत, वर्तमान मामले में अनुशासनात्मक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) और अभियोजन एजेंसी (Lokayukta/ACB) दो अलग-अलग संस्थाएं हैं। कोर्ट ने कहा:
“राधेश्याम केजरीवाल के मामले में कार्यवाही एक ही संस्था द्वारा की गई थी… जबकि इस मामले में ACB ने ट्रैप लगाया और आपराधिक कार्यवाही शुरू की, जबकि विभाग ने अलग से जांच की।”
‘अजय कुमार त्यागी’ के फैसले पर भरोसा पीठ ने स्टेट (NCT of Delhi) बनाम अजय कुमार त्यागी (2012) के फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था कि विभागीय कार्यवाही में दोषमुक्ति से आपराधिक मुकदमा अपने आप रद्द नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में साक्ष्य की सच्चाई का फैसला केवल वहां पेश किए गए सबूतों के आधार पर ही किया जा सकता है, न कि विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर।
जांच रिपोर्ट की खामियां सुप्रीम कोर्ट ने उस जांच रिपोर्ट का भी विश्लेषण किया जिसके आधार पर आरोपी को क्लीन चिट मिली थी। कोर्ट ने पाया कि यह दोषमुक्ति ‘गुण-दोष’ (Merits) पर नहीं थी, बल्कि मुख्य रूप से इसलिए थी क्योंकि ट्रैप लगाने वाले इंस्पेक्टर से पूछताछ नहीं की गई थी।
पीठ ने टिप्पणी की:
“इंस्पेक्टर का परीक्षण न किया जाना, हमारी राय में, ‘संभावनाओं की प्रबलता’ के आधार पर अनिवार्य नहीं है, खासकर तब जब दो स्वतंत्र गवाहों का परीक्षण किया गया हो।”
कोर्ट ने नोट किया कि शिकायतकर्ता और दो स्वतंत्र गवाहों ने रिश्वत की मांग, पैसों के लेनदेन और रंगे हाथों पकड़े जाने की घटनाओं की पुष्टि की थी। कोर्ट ने माना कि यह दोषमुक्ति गुण-दोष के आधार पर नहीं, बल्कि ‘उचित परिश्रम की कमी’ (Lack of Diligence) के कारण थी, जिसे तकनीकी आधार माना जा सकता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विभाग द्वारा इंस्पेक्टर को गवाह के रूप में पेश करने में विफलता आपराधिक मुकदमे को बंद करने का आधार नहीं बन सकती, जहां अभियोजन पक्ष अभी भी आवश्यक सबूत पेश कर सकता है।
कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का आदेश दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने जांच रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है, इसलिए इस फैसले के आधार पर विभागीय कार्यवाही को दोबारा नहीं खोला जाएगा।
केस विवरण
केस टाइटल: कर्नाटक लोकायुक्त बागलकोट जिला, बागलकोट बनाम चंद्रशेखर और अन्य
केस नंबर: क्रिमिनल अपील @ SLP (Crl.) No. 13057 of 2025 (2026 INSC 31)
पीठ: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

