सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा कानूनी शोधकर्ताओं (लॉ रिसर्चर्स) को बढ़ी हुई पारिश्रमिक राशि का पिछली तिथि से भुगतान करने के निर्देश को चुनौती दी गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
सुनवाई के दौरान पीठ ने सरकार की आपत्ति पर असहमति जताते हुए कहा:
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिससे बढ़ी हुई पारिश्रमिक राशि का भुगतान निर्धारित तिथि से करना अनिवार्य हो गया।
दिल्ली सरकार ने तर्क दिया कि:
- हाईकोर्ट के निर्देश वेतन और भत्तों से संबंधित हैं,
- ऐसे मामलों में अनुच्छेद 229(2) के तहत उपराज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक होती है,
- आदेश को पिछली तिथि से लागू करने पर राज्य को ₹9.45 करोड़ का अतिरिक्त और अनियोजित वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा।
इन्हीं आधारों पर सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने की मांग की थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने लॉ रिसर्चर्स का मासिक पारिश्रमिक ₹65,000 से बढ़ाकर ₹80,000 कर दिया था और इसे अक्टूबर 2022 से प्रभावी करने का निर्देश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को कायम रखा। इसके साथ ही लॉ रिसर्चर्स को संशोधित दर के अनुसार बकाया राशि पाने का मार्ग साफ हो गया।
अदालत के इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि प्रशासनिक देरी के कारण कर्मचारियों को उनके न्यायसंगत वित्तीय लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

