इकलौते बेटे को बेदखल करने वाली अपंजीकृत वसीयत प्रथम दृष्टया ‘संदिग्ध’: दिल्ली हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया

दिल्ली हाईकोर्ट ने राजौरी गार्डन स्थित एक संपत्ति के मालिकाना हक और कब्जे को लेकर यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने के अंतरिम आदेश की पुष्टि की है। कोर्ट ने कहा कि वादी के पिता द्वारा कथित तौर पर निष्पादित वसीयत, जिसमें उनके इकलौते बेटे को संपत्ति से बाहर रखा गया था और जिस पर केवल एक गवाह के हस्ताक्षर थे, प्रथम दृष्टया “संदिग्ध” और अवैध प्रतीत होती है।

न्यायमूर्ति अमित बंसल की पीठ ने कहा कि चूंकि प्रारंभिक वसीयत और उसके बाद की सेल डीड (Sale Deed) इस स्तर पर अवैध प्रतीत होती हैं, इसलिए यदि विवादित संपत्ति में किसी तीसरे पक्ष के अधिकार सृजित किए जाते हैं, तो इससे वादी को अपूरणीय क्षति होगी, जिसकी भरपाई किसी क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity Bond) से नहीं की जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

वादी, मनमोहन कुमार ने एक मुकदमा दायर कर 19 सितंबर 1986 को उनकी मां, स्वर्गीय श्रीमती राधा रानी द्वारा एक किरायेदार, स्वर्गीय श्री चंदर मोहन नैयर के पक्ष में निष्पादित सेल डीड को शून्य घोषित करने की मांग की थी। उन्होंने प्रतिवादियों के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की भी मांग की।

वादी ने बताया कि उनके पिता, स्वर्गीय श्री मदन गोपाल मधोक, जे-6/50 राजौरी गार्डन स्थित संपत्ति के पंजीकृत मालिक थे। वादी के अनुसार, उनके पिता की मृत्यु 14 जुलाई 1981 को बिना वसीयत किए (Intestate) हो गई थी, जिससे वादी और उनकी मां ही एकमात्र कानूनी वारिस रह गए। वादी का आरोप है कि किरायेदार द्वारा पैदा किए गए मतभेदों के कारण उन्हें 1986 में संपत्ति छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि उन्हें विवादित सेल डीड के बारे में जनवरी 2021 में तब पता चला जब उन्होंने स्वामित्व दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियों के लिए आवेदन किया।

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वादी ने यह भी आरोप लगाया कि प्रतिवादी अवैध रूप से संपत्ति को ध्वस्त करने और उसका नवीनीकरण करने का प्रयास कर रहे थे।

पक्षों की दलीलें

वादी का पक्ष: वादी ने तर्क दिया कि चूंकि उनके पिता की मृत्यु बिना वसीयत के हुई थी, इसलिए उनकी मां संपत्ति की पूर्ण स्वामी (Absolute Owner) नहीं बनी थीं। उन्होंने दावा किया कि संपत्ति में उनका 50% हिस्सा है, और उनकी मां ने उनकी सहमति के बिना विवादित सेल डीड निष्पादित की।

वादी के वकील, श्री अरुण धीमान ने दलील दी कि प्रतिवादी संख्या 3 द्वारा जिस 10 जनवरी 1981 की वसीयत का सहारा लिया जा रहा है, वह फर्जी है। उन्होंने बताया कि वसीयत अपंजीकृत (Unregistered) थी, उसमें झूठा कहा गया था कि माता-पिता की कोई संतान नहीं थी, और उस पर केवल एक गवाह द्वारा सत्यापित किया गया था।

प्रतिवादी का पक्ष: प्रतिवादी संख्या 3, जिनका प्रतिनिधित्व श्री गौरव कुमार ने किया, ने तर्क दिया कि वादी के पिता ने मां के पक्ष में 10 जनवरी 1981 को एक वैध वसीयत छोड़ी थी, जिससे वह पूर्ण स्वामी बन गई थीं। इस वसीयत के आधार पर, मां ने 1986 में 2,00,000 रुपये में श्री चंदर मोहन नैयर को संपत्ति बेच दी।

प्रतिवादी ने तर्क दिया कि संपत्ति तब से कई बार हस्तांतरित हो चुकी है, और वर्तमान मालिकों (प्रतिवादी संख्या 3 और 10) ने इसे उचित जांच-पड़ताल (Due Diligence) के बाद खरीदा है। यह भी तर्क दिया गया कि वादी को निष्पादन के समय से ही सेल डीड के बारे में पता था और यह मुकदमा समय-बाधित (Time-barred) है। प्रतिवादी संख्या 3 ने तीसरे पक्षों को निर्मित फ्लोर बेचने की अनुमति पाने के लिए क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity Bond) जमा करने की पेशकश की।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

न्यायमूर्ति बंसल ने 10 जनवरी 1981 की वसीयत की जांच की, जो प्रतिवादियों के मालिकाना हक का आधार थी। कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विसंगति नोट की:

“वसीयत में यह कहा गया है कि वसीयतकर्ता (वादी के पिता) की स्वर्गीय श्रीमती राधा रानी के साथ शादी से कोई संतान नहीं थी। यह सच नहीं हो सकता क्योंकि यह स्वीकार्य स्थिति है कि वादी का जन्म श्री मदन गोपाल मधोक और श्रीमती राधा रानी के विवाह से हुआ था। इसलिए, प्रथम दृष्टया, वसीयत संदिग्ध परिस्थितियों में निष्पादित प्रतीत होती है।”

कोर्ट ने वसीयत के निष्पादन में कानूनी खामियों को भी देखा:

“वसीयत के अवलोकन से पता चलता है कि अपंजीकृत होने के अलावा, उक्त वसीयत पर केवल एक सत्यापन गवाह (Attesting Witness) के हस्ताक्षर हैं। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63 के तहत, यह अनिवार्य आवश्यकता है कि वसीयत को कम से कम दो गवाहों द्वारा सत्यापित किया जाना चाहिए।”

इन निष्कर्षों के आधार पर, कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया, वादी की मां को विवादित संपत्ति का पूर्ण स्वामी नहीं कहा जा सकता था और इस प्रकार वह पूरी संपत्ति के लिए विवादित सेल डीड निष्पादित नहीं कर सकती थीं। नतीजतन, कोर्ट ने नोट किया:

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“एक बार जब वसीयत की वास्तविकता और वैधता पर संदेह पैदा हो जाता है, तो विवादित संपत्ति के संबंध में बाद के सभी बिक्री/खरीद दस्तावेज भी प्रथम दृष्टया अवैध होंगे।”

प्रतिवादी द्वारा क्षतिपूर्ति बांड प्रस्तुत करने की पेशकश को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और कहा:

“अचल संपत्ति में स्वामित्व का अधिकार एक मूल अधिकार (Substantive Right) है और इसे केवल क्षतिपूर्ति बांड द्वारा प्रतिस्थापित या निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता है… एक बार जब विवादित संपत्ति में तीसरे पक्ष के अधिकार सृजित हो जाते हैं, तो वादी को विवादित संपत्ति में उसके मूल अधिकार के लिए मुआवजा नहीं दिया जा सकता है और कोई भी क्षतिपूर्ति बांड किसी काम का नहीं होगा।”

फैसला

हाईकोर्ट ने मुकदमे के अंतिम निर्णय तक विवादित संपत्ति के मालिकाना हक और कब्जे के संबंध में यथास्थिति (Status Quo) के आदेश की पुष्टि की। कोर्ट ने आदेश XXXIX नियम 1 और 2 सीपीसी के तहत वादी के आवेदन का निपटारा किया और आदेश XXXIX नियम 4 सीपीसी के तहत प्रतिवादी के आवेदन को खारिज कर दिया।

मामले को 13 मार्च 2026 को रोस्टर बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया गया है।

मामले का विवरण:

वाद शीर्षक: मनमोहन कुमार बनाम नीलम खुराना व अन्य

वाद संख्या: CS(OS) 626/2023

पीठ: न्यायमूर्ति अमित बंसल

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