पंजीकृत सेल दस्तावेजों को ‘लोन की सिक्योरिटी’ बताकर चुनौती नहीं दी जा सकती: दिल्ली हाईकोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 के तहत मुकदमा खारिज किया

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय में उस दीवानी मुकदमे (Civil Suit) को खारिज कर दिया है, जिसमें पंजीकृत ‘एग्रीमेंट टू सेल’, ‘जीपीए’ (GPA) और ‘वसीयत’ को “फर्जी” (Sham) करार देने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 92 के तहत, किसी लिखित और पंजीकृत अनुबंध की शर्तों को झुठलाने के लिए मौखिक साक्ष्य (Oral Evidence) पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने 23 फरवरी, 2026 को दिए गए अपने फैसले में प्रतिवादियों द्वारा दायर उस आवेदन को स्वीकार कर लिया, जिसमें आदेश XII नियम 6 सीपीसी (CPC) के तहत मुकदमे को खारिज करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट का मानना है कि जब किसी अनुबंध की शर्तों को औपचारिक रूप से लिख लिया जाता है और पंजीकृत कर दिया जाता है, तो उसे केवल “वित्तीय व्यवस्था” (Financing Arrangement) साबित करने के लिए मौखिक गवाही स्वीकार्य नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

मुकदमा गोपाल कृष्ण श्रीवास्तव बनाम मेसर्स लाक्रास इन्फ्राकॉन प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य के बीच था, जो द्वारका सेक्टर 23 स्थित एक आवासीय प्लॉट (प्लॉट नंबर 121) से संबंधित था। यह प्लॉट वादी को 2010 में डीडीए (DDA) द्वारा आवंटित किया गया था। डीडीए को भुगतान करने के लिए, वादी ने दावा किया कि उसने प्रतिवादी नंबर 2 से लगभग ₹40,00,000 का ऋण लिया था।

वादी का आरोप था कि इस ऋण की सुरक्षा (Security) के तौर पर उसने 12 जुलाई 2010 को प्रतिवादी नंबर 1 कंपनी के पक्ष में एग्रीमेंट टू सेल, जीपीए और वसीयत जैसे कई दस्तावेज पंजीकृत कराए थे। वादी के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच यह सहमति थी कि संपत्ति के अधिकारों को हस्तांतरित करने का कोई इरादा नहीं था और ये दस्तावेज केवल ऋण की गारंटी के रूप में थे।

विवाद तब बढ़ा जब 2022 में प्रतिवादियों ने वादी के पक्ष में डीडीए को ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) जारी किया, लेकिन बाद में कथित तौर पर मूल दस्तावेज वापस करने से इनकार कर दिया। वादी ने इन दस्तावेजों को रद्द करने और संपत्ति का कब्जा वापस पाने के लिए मुकदमा दायर किया था।

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पक्षों की दलीलें

वादी की दलील: वादी ने तर्क दिया कि 2010 के दस्तावेज “दिखावटी” थे और केवल सुरक्षा के उद्देश्य से बनाए गए थे। उन्होंने 2022 में प्रतिवादियों द्वारा जारी एनओसी का हवाला देते हुए कहा कि इससे साबित होता है कि प्रतिवादियों का संपत्ति पर कोई मालिकाना हक नहीं था।

प्रतिवादियों की दलील: प्रतिवादियों ने सीपीसी के आदेश XII नियम 6 के तहत आवेदन दाखिल कर मुकदमे को खारिज करने की मांग की। उनका तर्क था कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 के तहत यह मुकदमा बाधित है, क्योंकि वादी मौखिक दलीलों के जरिए पंजीकृत दस्तावेजों की शर्तों को बदलने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि मुकदमा समय सीमा (Limitation) के बाहर है और उन्होंने ₹52,25,000 का भुगतान किया है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने सबसे पहले समय सीमा (Limitation) के मुद्दे पर प्रतिवादियों से असहमति जताई और कहा कि यह मुकदमा कानूनी रूप से समय पर है। हालांकि, “दिखावटी दस्तावेजों” के दावे पर कोर्ट ने वादी के पक्ष को कानूनी रूप से अस्थिर पाया।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 का प्रभाव: हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 92 उन मौखिक समझौतों के साक्ष्य को वर्जित करती है जो लिखित अनुबंधों के विपरीत हों। कोर्ट ने कहा:

“मेरी राय में, वादी का पूरा मामला एक मौखिक वित्तीय व्यवस्था पर टिका है, जिसके लिए वादी ने एक भी ऐसा दस्तावेज पेश नहीं किया है जो यह दर्शा सके कि ये सभी दस्तावेज केवल ऋण की सुरक्षा के लिए निष्पादित किए गए थे।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि एनओसी जारी करने का मतलब यह नहीं है कि 2010 के एग्रीमेंट टू सेल की शर्तों को बदला जा सकता है।

उच्चतम न्यायालय के निर्णयों का संदर्भ: हाईकोर्ट ने मंगला वामन करंदीकर बनाम प्रकाश दामोदर रानाडे (2021) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि धारा 92 विशेष रूप से किसी भी मौखिक समझौते या बयान के साक्ष्य को प्रतिबंधित करती है जो लिखित शर्तों का खंडन करे या उनमें बदलाव करे।

इसी तरह, तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम एन. राजू रेड्डीयार (1996) का जिक्र करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि एक बार अनुबंध लिखित रूप में हो जाने के बाद, पक्षकार उसकी शर्तों से बंधे होते हैं।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि वादी ने खुद ही पंजीकृत दस्तावेजों को स्वीकार किया है और उनके पास ऋण के संबंध में कोई लिखित प्रमाण नहीं है, इसलिए वे पंजीकृत बिक्री दस्तावेजों के खिलाफ मौखिक साक्ष्य नहीं दे सकते।

कोर्ट ने आदेश दिया:

“यह अदालत इस राय पर पहुंची है कि मुकदमे को खारिज करने की डिक्री पारित की जानी चाहिए, क्योंकि यह उन स्वीकृत दस्तावेजों पर आधारित है जो स्वयं वादी ने पेश किए हैं।”

मुख्य मुकदमे को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादियों द्वारा दायर ‘काउंटर-क्लेम’ (विशिष्ट निष्पादन के लिए) पर विचार जारी रहेगा और इसके लिए अगली सुनवाई 21 अप्रैल, 2026 को तय की गई है।

  • केस का शीर्षक: गोपाल कृष्ण श्रीवास्तव बनाम मेसर्स लाक्रास इन्फ्राकॉन प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य
  • केस संख्या: CS(OS) 685/2022

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