रिश्तेदारों को संपत्ति में रहने की अनुमति देने मात्र से मालिकाना हक नहीं मिलता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी संपत्ति में रहने का लाइसेंस या अनुमति, चाहे वह परिवार के किसी सदस्य को ही क्यों न दी गई हो, संपत्ति में कोई हित या मालिकाना हक पैदा नहीं करता है। अदालत ने कहा कि संपत्ति का मालिक ऐसी अनुमति को कभी भी रद्द कर सकता है।

न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ ने कल्याण दास (याचिकाकर्ता) के कानूनी वारिसों द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें विजय नगर स्थित संपत्ति का मालिकाना हक प्रवीण चावला (प्रतिवादी) के पक्ष में माना गया था और याचिकाकर्ताओं को कब्जा सौंपने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि उक्त संपत्ति हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय का है। लधा राम (प्रतिवादी के पिता) और उनके छोटे भाई कल्याण दास (याचिकाकर्ता) विभाजन के बाद भारत आए थे। शुरुआत में परिवार तंबुओं में रहा, जिसके बाद 1950 में भारत सरकार ने लधा राम को किराए के आधार पर उक्त संपत्ति आवंटित की।

1957 में लधा राम ने पुनर्वास मंत्रालय से संपत्ति खरीदने के लिए आवेदन किया। 8 जुलाई 1971 को उनके नाम पर परपेचुअल लीज डीड पंजीकृत की गई। 1977 में लधा राम का निधन हो गया और 1996 में उनकी पत्नी का भी देहांत हो गया। इसके बाद, लधा राम के अन्य कानूनी वारिसों ने अपने हिस्से प्रवीण चावला के पक्ष में छोड़ दिए। 25 अगस्त 1999 को प्रवीण चावला के पक्ष में कन्वेंस डीड निष्पादित की गई, जिससे संपत्ति फ्रीहोल्ड हो गई।

याचिकाकर्ता कल्याण दास संपत्ति के 15′ x 22′ माप वाले हिस्से में रह रहे थे। 1996 में, प्रतिवादी ने एक समझौता और वसीयत निष्पादित की, जिसमें उनके चाचा (याचिकाकर्ता) को उनके जीवनकाल तक उस हिस्से में रहने की अनुमति दी गई। हालांकि, विवादों के बाद प्रतिवादी ने 2009 में वसीयत रद्द कर दी और 2010 में लाइसेंस रद्द कर दिया। इसके बाद कब्जे और हर्जाने (mesne profits) के लिए मुकदमा दायर किया गया।

READ ALSO  हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री से क्रिकेटर धोनी को उनके खिलाफ पूर्व बिजनेस साझेदारों द्वारा किए गए मानहानि के मुकदमे की जानकारी देने को कहा

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता का तर्क: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह संपत्ति पाकिस्तान में छोड़ी गई पुश्तैनी संपत्ति के बदले संयुक्त परिवार को आवंटित की गई थी, इसलिए यह एक HUF संपत्ति है जिसमें उनका भी हिस्सा है। उन्होंने दावा किया कि वे 1960 से कब्जे में हैं और 1996 का समझौता पारिवारिक बंटवारे की मान्यता थी। यह भी तर्क दिया गया कि मुकदमा परिसीमा (limitation) द्वारा बाधित था।

प्रतिवादी का तर्क: प्रतिवादी ने परपेचुअल लीज डीड और कन्वेंस डीड के आधार पर पूर्ण स्वामित्व का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता केवल एक लाइसेंसधारी (licensee) थे जिन्हें प्रेम और स्नेह के कारण परिसर में रहने की अनुमति दी गई थी। प्रतिवादी ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता ने 1996 के समझौते को स्वीकार किया था, जिसमें स्पष्ट रूप से प्रतिवादी को मालिक माना गया था।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

स्वामित्व और HUF के दावे पर: हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस दावे को खारिज कर दिया कि संपत्ति संयुक्त परिवार की थी। न्यायमूर्ति पुष्करणा ने कहा कि HUF के अस्तित्व को साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होता है जो इसका दावा करता है। कोर्ट ने नोट किया कि 1950 में शुरुआती आवंटन किराए के आधार पर था और इससे मालिकाना अधिकार नहीं मिले थे। स्वामित्व केवल तब स्थापित हुआ जब लधा राम ने संपत्ति खरीदी।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

READ ALSO  सफदरजंग अस्पताल में मरीजों से पैसे वसूलने के आरोपी शख्स को कोर्ट ने दी जमानत

“प्रतिवादी के पिता श्री लधा राम को उक्त संपत्ति का मालिकाना अधिकार मिलने से पहले, संपत्ति सरकार में निहित थी… केवल आवंटन पत्र जारी करने से संपत्ति में कोई मालिकाना अधिकार नहीं बन जाता।”

कब्जे की प्रकृति (लाइसेंस बनाम हित): कोर्ट ने 24 सितंबर 1996 के समझौते का विश्लेषण किया और पाया कि इसमें प्रतिवादी को “मालिक/पट्टेदार” और याचिकाकर्ता को एक हिस्से पर काबिज व्यक्ति के रूप में संदर्भित किया गया था। कोर्ट ने कहा कि यह समझौता एक प्रतिसंहरणीय (revocable) लाइसेंस था, न कि संपत्ति में कोई हित।

सुप्रीम कोर्ट के प्रदीप ऑयल कॉरपोरेशन बनाम दिल्ली नगर निगम (2011) के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि लाइसेंस संपत्ति में कोई जागीर या हित नहीं बनाता है।

कोर्ट ने कहा:

“24 सितंबर, 1996 का लाइसेंस समझौता एक अपरिवर्तनीय लाइसेंस नहीं था, क्योंकि पार्टियों का इरादा समझौते की शर्तों से स्पष्ट है, और इसने संपत्ति में अपीलकर्ता के पक्ष में कोई हित नहीं बनाया।”

स्वामित्व की स्वीकृति: कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि याचिकाकर्ता ने 1996 के समझौते और वसीयत के निष्पादन को स्वीकार किया था। चूंकि वसीयत केवल एक मालिक द्वारा ही निष्पादित की जा सकती है, इसलिए इन दस्तावेजों पर याचिकाकर्ता का भरोसा प्रतिवादी के स्वामित्व की स्वीकृति के बराबर था।

READ ALSO  पति-पत्नी ने एक दूसरे पर किए 60 मुक़दमे, सुप्रीम कोर्ट ने कहा ये वकीलों की चतुराई- जाने विस्तार से

परिसीमा (Limitation): कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि मुकदमा समय सीमा से बाधित था। कोर्ट ने कहा कि वाद का कारण (cause of action) 2009 में उत्पन्न हुआ जब वसीयत रद्द की गई और 2010 में जब कानूनी नोटिस के माध्यम से लाइसेंस औपचारिक रूप से रद्द किया गया।

निर्णय

हाईकोर्ट ने अपीलों (RFA 474/2013 और RFA 475/2013) को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट के 16 मई 2013 के फैसले को बरकरार रखा।

  1. कब्जा: याचिकाकर्ता के कानूनी वारिसों को निर्देश दिया गया कि वे “तत्काल प्रभाव से अपने कब्जे वाले संपत्ति के हिस्से को प्रतिवादी को सौंप दें।”
  2. हर्जाना/मेस्ने प्रॉफिट्स: कोर्ट ने 5,000 रुपये प्रति माह के हर्जाने के साथ 1 जून 2010 से कब्जा सौंपने तक 12% वार्षिक ब्याज के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट में पहले से जमा की गई राशि को प्रतिवादी को जारी करने का आदेश दिया गया।
  3. बढ़ाया गया हर्जाना: कोर्ट ने 5,000 रुपये से अधिक के हर्जाने के प्रतिवादी के अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि प्रचलित बाजार किराए के संबंध में साक्ष्य की कमी है।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: कल्याण दास (कानूनी वारिसों के जरिए) बनाम प्रवीण चावला
  • केस नंबर: RFA 474/2013 & RFA 475/2013
  • कोरम: न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles