दिल्ली हाईकोर्ट ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस की स्वतंत्रता की महत्वपूर्ण भूमिका को दोहराते हुए कहा है कि पत्रकारों को अपना पेशेवर निर्णय लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, और उन्हें अनावश्यक कानूनी परिणामों से संरक्षित किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने एक मीडिया संस्थान के खिलाफ दायर मानहानि याचिका को खारिज करते हुए दी। यह याचिका एक कंपनी द्वारा एक इंटरनेट मैगजीन में प्रकाशित लेख को लेकर दायर की गई थी।
अदालत ने अपने फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्ति की प्रतिष्ठा के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उक्त लेख में उनकी कंपनी की कार्य संस्कृति की आलोचना की गई थी, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। हालांकि, न्यायमूर्ति कौरव ने यह ध्यान दिलाया कि लेख प्रकाशित होने के एक साल बाद कंपनी ने प्रतिबंध लगाने की मांग की, जिससे उनकी याचिका की तात्कालिकता पर सवाल खड़े होते हैं।
न्यायमूर्ति कौरव ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि लेख में दुर्भावना, सत्य के प्रति लापरवाही या गंभीर लापरवाही का कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं है, इसलिए इसे असामान्य रूप से उच्च स्तर की सटीकता के मानकों पर परखा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा, “पत्रकारिता के दृष्टिकोण से यह लेख लापरवाह रिपोर्टिंग की श्रेणी में नहीं आता और इसे स्रोत-आधारित तथा संदर्भ-विशिष्ट रिपोर्टिंग बताया गया है।”

कोर्ट ने मानहानि मामलों से जुड़े सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जहां तक प्रकाशन का सार सत्य है, वहां मामूली अशुद्धियों की तुलना में ‘सारगर्भित सत्य’ को महत्व दिया जाना चाहिए। 24 मार्च को पारित आदेश में यह स्पष्ट किया गया कि इस तरह की रिपोर्टिंग को रोकना उस संतुलन को बिगाड़ सकता है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा के अधिकार के बीच जरूरी है, और इससे अनुचित रूप से प्रतिष्ठा के अधिकार को प्राथमिकता मिलने का खतरा हो सकता है।