दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बाल गवाहों की गवाही में मामूली विरोधाभास या पुलिस जांच में कमी मात्र से अभियोजन का पूरा मामला खारिज नहीं किया जा सकता। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा की बेंच ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखा है। हालांकि, घटना के वक्त दोषी की कम उम्र (24 वर्ष) को देखते हुए कोर्ट ने आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) की सजा को 3 साल से घटाकर 1 साल कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील अलाउद्दीन उर्फ शकील बनाम स्टेट मामले में दायर की गई थी, जिसमें कड़कड़डूमा स्थित विशेष अदालत के 5 फरवरी 2018 के फैसले को चुनौती दी गई थी। निचली अदालत ने मुख्य आरोपी (A1) को POCSO एक्ट की धारा 10 और IPC की धारा 506 (भाग II) के तहत दोषी ठहराया था, जबकि दूसरे आरोपी (A2) को बरी कर दिया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 17 अक्टूबर 2016 से लगभग दो महीने पहले, आरोपी ने सोनिया विहार, दिल्ली में तीन नाबालिग लड़कियों को गलत तरीके से एक कमरे में बंधक बनाया और उनका यौन उत्पीड़न किया। आरोपी ने पीड़ितों को घटना का खुलासा करने पर जान से मारने की धमकी भी दी थी।
मामले का खुलासा तब हुआ जब एक स्कूल टीचर (PW9) ने कक्षा में दो पीड़ित लड़कियों को आपस में पर्चियां (notes) बदलते हुए पकड़ा। उन पर्चियों में ‘चाचा कालिया’ (आरोपी) द्वारा पैसे देकर गलत काम करने की बातें लिखी थीं। टीचर ने तुरंत प्रिंसिपल को सूचित किया, जिसके बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।
दलीलों पर गौर
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि सह-आरोपी को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया है, इसलिए मुख्य आरोपी को भी बरी किया जाना चाहिए। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि पीड़ितों के बयानों में कई विरोधाभास हैं और एक पीड़ित ने शुरू में आरोपी द्वारा कोई गलत काम न करने की बात कही थी। इसके अलावा, जांच में एक बड़ी खामी यह बताई गई कि गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी का स्थान सोनिया विहार लिखा था, जबकि डेली डायरी (DD) एंट्री में उत्तर प्रदेश दर्ज था।
वहीं, सरकारी वकील ने दलील दी कि पीड़ित बच्चियां डरी हुई थीं, इसलिए शुरू में हिचक रही थीं। उन्होंने जोर दिया कि मुख्य घटनाओं पर सभी गवाहों के बयान एक समान हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और फैसला
जस्टिस सुधा ने गवाहों और सबूतों का बारीकी से विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:
- बाल गवाहों की विश्वसनीयता: कोर्ट ने माना कि बच्चों के बयानों में कुछ विसंगतियां स्वाभाविक हैं। कोर्ट ने कहा:
“यह ध्यान रखना होगा कि घटना के समय पीड़िता काफी छोटी थी। जब 2017 में उसकी गवाही हुई तो वह 11 साल की थी, जबकि घटना 2016 की है। इसलिए कुछ विसंगतियां होना स्वाभाविक है। लेकिन सभी बयानों को समग्र रूप से देखने पर एक बात स्पष्ट है कि आरोपी पीड़ितों को अपने कमरे में ले जाता था और उनके साथ गलत हरकतें करता था।” - जांच में खामी: गिरफ्तारी के स्थान को लेकर पुलिस की गलती पर कोर्ट ने स्टेट ऑफ यूपी बनाम हरि मोहन (2000) और गंगा सिंह बनाम स्टेट ऑफ एमपी (2013) के फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा:
“यदि अभियोजन पक्ष आरोपी के दोष को संदेह से परे साबित कर देता है, तो केवल जांच में कुछ खामियों के आधार पर अदालत आरोपी को बरी नहीं कर सकती। बरी तभी किया जा सकता है जब जांच की खामियां अभियोजन की कहानी पर ही संदेह पैदा कर दें।” - दस्तावेजी सबूत: कोर्ट ने टीचर द्वारा जब्त की गई पर्चियों को अहम सबूत माना, जिसमें बच्चों ने अपनी आपबीती लिखी थी।
सजा पर फैसला
हाईकोर्ट ने POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत 6 साल के सश्रम कारावास और 30,000 रुपये के जुर्माने को बरकरार रखा। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपी का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड भी है और उसने जेल से छूटने के बाद भी बच्चियों का उत्पीड़न जारी रखा, जिससे पता चलता है कि उसे कानून का कोई डर नहीं है।
हालांकि, IPC की धारा 506 (धमकी देना) के तहत सजा पर विचार करते हुए कोर्ट ने नरमी बरती।
“यह देखते हुए कि घटना के समय अपीलकर्ता/आरोपी की उम्र केवल 24 वर्ष थी, IPC की धारा 506 (भाग II) के तहत कारावास की सजा को घटाकर एक वर्ष किया जाता है।”
दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
केस डिटेल्स
- केस का नाम: अलाउद्दीन उर्फ शकील बनाम स्टेट (NCT of Delhi)
- केस नंबर: CRL.A. 328/2018
- कोरम: जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा
- अपीलकर्ता के वकील: सुश्री सुनीता अरोड़ा (DHCLSC)
- प्रतिवादी के वकील: श्री उत्कर्ष (APP) और श्री लव मनन

