दिल्ली हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में 66 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता का शिकार हुई एक महिला खिलाड़ी की भविष्य की सर्जरी और इलाज के लिए बीमा कंपनी को 10 लाख रुपये देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने उसकी पढ़ाई प्रभावित होने और शादी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचने के लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) द्वारा दिए गए 6 लाख रुपये के मुआवजे को भी बरकरार रखा है।
जस्टिस अनीश दयाल ने सिमरन कौर और एक निजी बीमा कंपनी की अपीलों पर सुनवाई करते हुए कहा कि दुर्घटना के कारण किसी व्यक्ति को जीवन में मिलने वाले अवसरों से वंचित होना पड़े, तो मुआवजा तय करते समय इस नुकसान को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
5 अक्टूबर को दिए गए फैसले में हाईकोर्ट ने पढ़ाई प्रभावित होने के लिए 4 लाख रुपये और शादी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचने के लिए 2 लाख रुपये के मुआवजे के खिलाफ बीमा कंपनी की आपत्ति खारिज कर दी। इसके साथ ही भविष्य के इलाज के लिए पहले दिए गए 1 लाख रुपये को बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दिया।
पढ़ाई, खेल और परिवार बसाने के अवसर छिनने पर भी मुआवजा जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि गंभीर दुर्घटना से होने वाले नुकसान का आकलन केवल शारीरिक चोटों या आर्थिक नुकसान के आधार पर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के अनुसार, पढ़ाई करना, खेलों में हिस्सा लेना, करियर बनाना और भविष्य में अपना परिवार बसाना किसी भी व्यक्ति के जीवन की सामान्य उम्मीदें होती हैं। यदि दुर्घटना के कारण कोई व्यक्ति इन अवसरों से वंचित हो जाता है, तो उसे इस नुकसान के लिए उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
सिमरन कौर दुर्घटना के समय आठवीं कक्षा में पढ़ती थीं और खो-खो तथा लंबी कूद की प्रतिभाशाली खिलाड़ी थीं। न्यायाधिकरण के सामने पेश प्रमाणपत्रों से पता चला कि उन्होंने इन खेल प्रतियोगिताओं में पहला, दूसरा और तीसरा स्थान हासिल किया था।
बीमा कंपनी ने दलील दी कि सिमरन ने पढ़ाई प्रभावित होने के संबंध में स्कूल की मार्कशीट या उपस्थिति का रिकॉर्ड पेश नहीं किया था। इसलिए इस मद में 4 लाख रुपये का मुआवजा देना उचित नहीं था। कंपनी ने शादी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचने के लिए दिए गए 2 लाख रुपये पर भी सवाल उठाया।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने सिमरन की स्थायी दिव्यांगता, मेडिकल रिकॉर्ड और न्यायाधिकरण के सामने आए तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कहा कि दोनों मदों में दिया गया मुआवजा उचित है।
कोर्ट ने पहले के न्यायिक फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि पढ़ाई बाधित होने का असर केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहता। इससे भविष्य में रोजगार पाने, करियर बनाने और आजीविका कमाने की संभावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजे के अलग-अलग मदों को क्या नाम दिया गया है, यह निर्णायक नहीं है। असली सवाल यह है कि पीड़ित व्यक्ति को उसके वास्तविक नुकसान के लिए पर्याप्त मुआवजा मिला है या नहीं।
सर्जरी पर करीब 9.35 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान
सिमरन ने भविष्य के इलाज के लिए न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए 1 लाख रुपये को अपर्याप्त बताते हुए मुआवजा बढ़ाने की मांग की थी। उन्होंने सर गंगा राम अस्पताल में प्रस्तावित सर्जरी के खर्च का हवाला दिया।
इलाज की जरूरत और संभावित खर्च को समझने के लिए हाईकोर्ट ने अस्पताल के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. मनीष धवन से जानकारी मांगी।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए डॉक्टर ने बताया कि सिमरन की स्थिति में सुधार के लिए कम से कम तीन अलग-अलग सर्जरी की जरूरत होगी। इन प्रक्रियाओं के जरिए पैर की उंगलियां कटने और पैर की लंबाई कम होने से पैदा हुई समस्याओं का इलाज किया जाएगा।
डॉक्टर ने बताया कि यह जटिल इलाज है, जिसमें विशेष सॉफ्टवेयर और ऐसी तकनीकों की जरूरत होगी जो आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। पैर की लंबाई धीरे-धीरे बढ़ाए जाने के कारण पूरी तरह ठीक होने में लगभग एक साल लग सकता है।
3 फरवरी के अनुमान के अनुसार, अस्पताल में सिंगल रूम सहित इलाज का कुल खर्च करीब 9.35 लाख रुपये बताया गया था।
डॉक्टर ने कहा कि कम खर्च वाले कमरे का विकल्प चुनने पर लगभग 1 लाख रुपये की बचत हो सकती है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने सर्जरी की जटिलता और लंबे समय तक चलने वाले इलाज को देखते हुए सिंगल रूम की सुविधा को उचित माना।
कोर्ट ने कहा कि केवल इलाज का खर्च कम करने के लिए सिमरन को अतिरिक्त स्वास्थ्य जोखिम या शारीरिक तकलीफ उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
अंतिम खर्च में संभावित बदलाव को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने भविष्य की सर्जरी और इलाज के लिए 10 लाख रुपये देने का आदेश दिया।
2016 के हादसे में हुई थी गंभीर चोटें
यह मामला 12 मार्च 2016 की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। उस दिन सिमरन अपने पिता के साथ लुधियाना से दिल्ली और जयपुर की ओर जा रही बस में यात्रा कर रही थीं।
जीटी रोड पर पंछी गुजरां कट के पास एक ट्रक ने बस को टक्कर मार दी। हादसे में सिमरन गंभीर रूप से घायल हो गईं।
उनके बाएं पैर में विकृति आ गई। एड़ी और टखने की स्थिति भी प्रभावित हुई। पैर की कुछ उंगलियां काटनी पड़ीं और एक पैर की लंबाई कम हो गई।
मेडिकल जांच में उनकी स्थायी दिव्यांगता 66 प्रतिशत पाई गई।
दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट स्थित मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने 13 मार्च 2018 को सिमरन को 14,89,090 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। इस राशि पर सालाना 9 प्रतिशत ब्याज भी दिया जाना था।
इसके बाद बीमा कंपनी और सिमरन दोनों ने हाईकोर्ट में अपील की। बीमा कंपनी कुछ मदों में दिए गए मुआवजे को कम कराना चाहती थी, जबकि सिमरन ने भविष्य की सर्जरी के लिए अधिक राशि मांगी थी।
मई 2018 में हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को न्यायाधिकरण द्वारा तय पूरी राशि जमा करने का निर्देश दिया था। साथ ही सिमरन को 30 प्रतिशत मुआवजा जारी करने का आदेश दिया गया था।
चार सप्ताह के भीतर 10 लाख रुपये जमा करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने अब बीमा कंपनी को चार सप्ताह के भीतर मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण के समक्ष 10 लाख रुपये जमा करने का आदेश दिया है।
यह राशि ब्याज देने वाली फिक्स्ड डिपॉजिट में रखी जाएगी। सिमरन जब अस्पताल के जरूरी दस्तावेज पेश कर यह पुष्टि करेंगी कि उनकी सर्जरी की योजना तय हो गई है, तभी यह रकम उन्हें जारी की जाएगी।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पहले से स्वीकृत मुआवजे की कोई राशि यदि अभी तक बाकी है, तो उसे ब्याज सहित एकमुश्त सिमरन को दिया जाए।
इस तरह हाईकोर्ट ने पढ़ाई और शादी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचने के लिए पहले से दिए गए 6 लाख रुपये के मुआवजे को बरकरार रखते हुए भविष्य के इलाज के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता सुनिश्चित की है।

